वायु प्रदूषण क्या है?

वातावरण में धूल, धुएं, गैस, धुंध, गंध और वाष्प आदि के होने को वायु प्रदूषण कहा जाता है। वायु प्रदूषण मानव, पौधे, पशु जीवन और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है।
वायु प्रदूषण को समझने के लिए वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) को समझना भी जरूरी है। AQI एक क्षेत्र में वातावरण में नीचे बताए प्रदूषकों की मात्रा को मापता है,

जो इस प्रकार हैंः

1. ठोस वायु प्रदूषक- जलाऊ लकड़ी, फसल अवशेष, गोबर के उपले, कोयला, लिग्नाइट और चारकोल जैसे ठोस ईंधन को जलाने से निकालने वाला धुंआ।
2. तरल वायु प्रदूषक- घरों में गैसोलीन, मिट्टी के तेल और डीजल के इस्तेमाल से निकालने वाला धुंआ।
3. गैसीय वायु प्रदूषक- सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन जैसी गैसें।
4. ध्वनि (शोर) प्रदूषक- गाड़ी, इंजन, जनरेटर और पटाके आदि से निकलने वाली तेज आवाजें।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, ट्राइऑक्सीजन, सीसा, कार्बन मोनोऑक्साइड, अमोनिया, बेंजीन, आर्सेनिक, निकल और कण पदार्थ जैसे बारह प्रदूषकों को तय सीमा से नीचे रखना होता है। ये तय सीमाएं औद्योगिक, आवासीय, ग्रामीण, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों और केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए दूसरे क्षेत्रों के लिए अलग-अलग होती हैं।

स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार
स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, सभी भारतीयों को मिलने वाला अधिकार है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें प्रदूषण मुक्त हवा और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार शामिल है। अनुच्छेद 51ए (जी) पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के लिए हर नागरिक के कर्तव्य को भी बताता है।

अगर कोई व्यक्ति वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य से जुड़ी किसी परेशानी से पीड़ित है, तो उसे कानूनी रूप से शिकायत करने का अधिकार है। इस लेख में पढ़ें “आप वायु प्रदूषण पर कानूनी शिकायत किससे कर सकते हैं?”

वायु प्रदूषण के स्रोत और प्रभाव?

वायु प्रदूषण कई क्षेत्रों जैसे बिजली, परिवहन, उद्योग, घर, निर्माण और कृषि से जुड़ा है।

वायु प्रदूषण के स्रोत

जीवाश्म ईंधन और उत्सर्जन का जलना

ज्यादातर वायु प्रदूषण ऊर्जा के इस्तेमाल से होता है, जैसे जीवाश्म ईंधन का जलना जो जहरीली गैसों और रसायनों को हवा में छोड़ता है। कोयले और प्राकृतिक गैसों जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने से दो सबसे आम तरह के वायु प्रदूषण धुंध (स्माॅग) और कालिख होते हैं। धुंध और कालिख में मौजूद हवा में उड़ने वाले छोटे कण बहुत खतरनाक होते हैं, क्योंकि वे फेफड़ों और खून में प्रवेश कर जाते हैं और इससे ब्रोंकाइटिस और दिल की खतरनाक बीमारियां हो सकती है।
हानिकारक वायु प्रदूषकों के दूसरे स्रोत जैसे उद्योग, वाहन, सड़क और निर्माण क्षेत्र, कचरा जलाने से निकालने वाला धुंआ, घरों और डीजल जनरेटर सेटों से निकलने वाला धुंआ आदि हैं।

एयर कंडीशनर (एसी) का इस्तेमाल

एसी के बढ़ते इस्तेमाल से बिजली की बढ़ती मांग पर सीधा असर पड़ता है। बिजली की यह बढ़ती मांग सामूहिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को बढ़ाती है। बिजली क्षेत्र, प्रदूषणकारी ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सबसे ज्यादा बढ़ावा देता है। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का बढ़ता स्तर जिम्मेदार है। इस कारण से एसी का बढ़ता इस्तेमाल वायु प्रदूषण के कई कारणों में से एक है। वहीं एसी का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा भी है।

हालांकि, इस तरह के प्रदूषण को बढ़ाने के लिए किसी एक व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति ऊर्जा या वायु प्रदूषण को बढ़ाने के लिए अकेले जिम्मेदार नहीं है। यह एक समुदाय में एसी के बढ़ते इस्तेमाल के कारण वायु प्रदूषण को बढ़ा रहा है।

वाहन प्रदूषण

वाहनों से होने वाला प्रदूषण कुल वायु प्रदूषण का 60-70% भाग है। सरकार सख्त जन उत्सर्जन मानकों और प्रोटोकॉल, पुराने वाहनों को एक समय सीमा के बाद हटाने, वाहनों के रखरखाव और लेन अनुशासन के बारे में जागरूकता बढ़ाने, वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल जैसे उपायों द्वारा इस प्रदूषण को नियंत्रित कर रही है। साथ ही सरकार द्वारा इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों की संख्या और मेट्रो, ई-रिक्शा जैसे सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है।

वायु प्रदूषण के प्रभाव

जलवायु परिवर्तन

वायु प्रदूषण जलवायु परिवर्तन का कारण और प्रभाव दोनों है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ जाता है। इसके कारण बढ़ी हुई गर्मी से स्मॉग (धुंआ और कोहरा) और यूवी विकिरण में वृद्धि हो जाती है।

स्वास्थ्य प्रभाव

वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। हालांकि, वायु प्रदूषण का बुरा प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक ही नहीं है, बल्कि कृषि, मानव, पौधे और पशु जीवन पर भी पड़ता है। वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर प्रभावों के कारण आंख और गले में जलन, फेफड़ों को नुकसान व एलर्जी और अस्थमा के दौरे भी पड़ सकते हैं। प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने से त्वचा और लीवर से जुड़ी बीमारियां व प्रजनन अंगों को नुकसान हो सकता है। हवा में सीसा और मरकरी जैसे खतरनाक रसायनों के होने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फेफड़ों और दिल की बीमारियों के रोगियों के लिए भी वायु प्रदूषण बहुत हानिकरक होता है।

ध्वनि प्रदूषण क्या है?

शोरगुल रोजमर्रा की जिंदगी में सामान्य है, लेकिन जब यह एक निश्चित सीमा से ऊपर चला जाता है, तो इसे ध्वनि प्रदूषण के साथ-साथ सार्वजनिक परेशानी के रूप में भी देखा जाता है। उंचे स्तर का शोरगुल मनुष्य, जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों, और पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। ध्वनि प्रदूषण के सामान्य स्रोतों में उद्योग-धंधे, निर्माण कार्य, जनरेटर सेट आदि शामिल हैं। ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 का कानून भारत में ध्वनि प्रदूषण को नियमित और नियंत्रित करता है।

बिना शोरगुल के शांति से रहने का अधिकार

भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के तहत सभी को अपने घर में शांति, आराम और चैन से रहने का अधिकार है, और शोरगुल/हल्ला-गुल्ला से बचने और उसको रोकने का अधिकार है। कोई भी यहां तक कि अपने घर में भी शोरगुल पैदा करने के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है जिसके कारण अड़ोस-पड़ोस या अन्य लोगों को परेशानी होती हो। इसलिए किसी भी प्रकार का शोर/आवाज़ जो किसी व्यक्ति के जीवन की सामान्य सुख-शांति में बाधा डालता, उसे भी उपद्रव माना जाता है।

शोर का अर्थ

‘शोर’ शब्द की चर्चा किसी भी कानून में नहीं की गई है, लेकिन भारत में शोर को पर्यावरणीय प्रदूषक माना गया है और इसे पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य कारणों में से एक माना जाता है।

नॉइज़ (यानि शोर) लैटिन शब्द ‘NAUSEA’ से लिया गया है। कोर्ट ने शोर को ‘अवांछित ध्वनि के रूप में परिभाषित किया है, जो स्वास्थ्य और संचार के लिए जोखिम भरा है, जो सुनाई पड़ने वाली आवाज़ के रूप में, स्वास्थ्य पर होने प्रतिकूल असर की परवाह किये बिना हमारे पर्यावरण में डंप किया जाता है। ‘ उदाहरण के लिए, हॉर्न से होने वाली कर्कश ध्वनि अवांछित शोर का कारण बनता है लेकिन जो ध्वनि सुनने में अच्छा लगे, वह संगीत है, उसे शोर नहीं कहा जाता है।

ध्वनि प्रदूषण के कारण

शोर के मापने की इकाई को डेसिबल कहा जाता है। आप जिस क्षेत्र में रहते हैं उसके आधार पर आपको ध्वनि सीमा का पालन करना होगा। शोर (नॉइज़) को मापने के लिए वैज्ञानिक उपकरणों (जैसे ध्वनि मीटर) की आवश्यकता होती है, क्योंकि आपके पास हमेशा यह यंत्र उपलब्ध नहीं होता तो हर समय आपको यह जानकारी नहीं होती है कि आप किसी विशेष क्षेत्र के लिए निर्धारित ध्वनि सीमा को पार कर रहे हैं या नहीं। ऐसे मामलों में, आपको:

• यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप जो भी करते हैं या आप जिस किसी भी उपकरण का इस्तेमाल करते हैं, वह शोरगुल और दूसरों के लिए परेशानी का कारण न बने। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी पार्टी के दौरान गाना बजा रहे हैं, तो रात के समय जब लोग सो रहे हों, तब आवाज़ कम रखने की कोशिश करें।

• अपने पड़ोसियों या अपने आस-पास के लोगों द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अगर वे कहते हैं कि आपके शोरगुल से उन्हें परेशानी हो रही है, तो शोर को कम करने का प्रयास करें।

कृपया ध्यान रखें कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने अनजाने में या जानबूझकर शोर किया है; केवल यह मायने रखता है कि क्या आपने बहुत अधिक शोर मचाया है।

ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ शिकायत

यदि किसी शोर से आपको झुंझलाहट, अशांति या कोई क्षति होती है, तो आप पुलिस या अपने राज्य के ‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। अगर आपको लगता है कि शोर का स्तर आपको परेशान कर रहा है या यह रात के 10:00 बजे से सुबह 6:00 बजे के बीच होता है, तो आप इसकी शिकायत भी कर सकते हैं।

वायु प्रदूषण कानूनों के तहत बने प्राधिकरण

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ कानून के तहत वायु प्रदूषण की निगरानी के लिए बनाए गए प्राधिकरण हैं। उनके पास निम्नलिखित शक्तियां और काम हैंः

– वायु प्रदूषण के रोकथाम, नियंत्रण और सुधार से जुड़े सभी मामलों पर केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देना।

– वायु प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कार्यक्रमों की योजना बनाना और उन्हें लागू करना।

– वायु गुणवत्ता/एक्यूआई के मानक तय करना।

– किसी राज्य में औद्योगिक संयंत्रों को चलाने की अनुमति देना। किसी भी राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पहले से ली अनुमति के बिना कोई भी औद्योगिक संयंत्र लगाए और चलाए नहीं जा सकते हैं।

अपीलीय प्राधिकरण

राज्य सरकारें पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विवादों को संभालने के लिए अपीलीय प्राधिकरण बनाती हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक राज्य में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय कर्नाटक राज्य अपीलीय प्राधिकरण है। अगर कोई राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश के खिलाफ अपील करना चाहता है, तो वह सिविल कोर्ट में नहीं बल्कि अपीलीय प्राधिकरण में जाकर अपील करेगा।

अपीलीय प्राधिकरण के निर्णयों और आदेशों के खिलाफ अपील करने के लिए आप राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के पास जा सकते हैं । राष्ट्रीय हरित अधिकरण भारत का पहला पर्यावरण न्यायालय है, जिसके पास न केवल पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन से निपटने के लिए व्यापक अधिकार है, बल्कि ‘प्रदूषक भुगतान करता है’ सिद्धांत के अनुसार क्षतिपूर्ति, राहत और पारिस्थिति की बहाली और ‘एहतियाती सिद्धांत’ को लागू करने की शक्तियाँ भी हैं।

प्रदूषण नियंत्रण समितियां

प्रदूषण नियंत्रण समितियां नियामक निकाय हैं, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गठित होती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कुछ क्षेत्रों के लिए इन समितियों को अपनी शक्तियां और काम सौंप सकता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की स्थापना 1991 में दिल्ली के लिए एक राज्य बोर्ड के तौर में काम करने के लिए की गई थी।

ध्वनि प्रदूषण के लिए सजा

ध्वनि प्रदूषण करना कानून के तहत एक दंडनीय अपराध है, और जिम्मेदार व्यक्ति को निम्नलिखित तरीके से दंडित किया जा सकता है:

सार्वजनिक परेशानी के कारण

जब आपके द्वारा किया गया कोई शोर, जनता को हानि पहुंचाता है, या उसके लिए खतरा या झुंझलाहट का कारण बनता है, तो इस प्रकार से शोर करना सार्वजनिक उपद्रव माना जाता है। उदाहरण के लिए यदि आपका पड़ोसी आधी रात को बहुत जोर से साउंड सिस्टम बजाता है, तो इसे सार्वजनिक उपद्रव माना जायेगा।

इस तरह के उपद्रव के लिए सजा के तौर पर 200 रुपये तक का जुर्माना है। अगर आप कोर्ट द्वारा शोर को रोकने के निर्देश के बाद भी शोरगुल करना जारी रखते हैं तो आपको 6 महीने तक की जेल और जुर्माने की सजा हो सकती है।

पर्यावरण प्रदूषण

चूंकि ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण और परिवेश को काफी नुकसान पहुंचाता है, इसलिए इसे कानून के तहत गंभीरता से लिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी भवन के निर्माण से होने वाले शोर के कारण आपके लिए सामान्य जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो रहा है, तो यह ध्वनि प्रदूषण का एक रूप है। इस अपराध के लिए पांच साल तक की जेल या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना, या फिर दोनों की सजा हो सकती है।

इसके बावजूद भी यदि ध्वनि प्रदूषण जारी रहता है, तो आपको हर दिन 5,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लग सकता है। अगर शोर बंद करने के आदेश के बावजूद भी एक साल से अधिक समय तक शोर जारी रहता है, तो आपको 7 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।

आपको ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार है और ऐसी शिकायत मिलने पर अधिकारी (ऑथोरिटी) जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।

राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम क्या है?

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में वायु गुणवत्ता को देखने के लिए राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) की स्थापना की। एनएएमपी का मकसद हैः

  • आस-पास की वायु गुणवत्ता की स्थिति और रुझान को तय करना
  • यह देखना कि क्या आस-पास की तय वायु गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा
  • 5 साल से लगातार राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) को पूरा नहीं कर रहे शहरों को पहचाना और उन्हें ऐसे शहरों के तौर पर चिह्नित करना
  • निवारक और सुधारात्मक उपायों को विकसित करने के लिए जानकारी और उचित समझ को इकट्ठा करना
  • प्रदूषण के कम होने, फैलाव, हवा आधारित गति, शुष्क जमाव, बारिश और प्रदूषकों के रासायनिक बदलाव के द्वारा पर्यावरण में होने वाली प्राकृतिक सफाई की प्रक्रिया को समझना

एनएएमपी वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के चार प्रमुख प्रदूषकों सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हवा में मौजूद कण पदार्थ और महीन कण पदार्थ की निगरानी करता है। यह आपेक्षिक नमी और तापमान के साथ-साथ हवा की गति और दिशा की भी जांच करता है।

एनएएमपी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, प्रदूषण नियंत्रण समितियों और राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI), नागपुर के संयुक्त प्रयासों से बनाया गया है।

 

वायु प्रदूषण कानून के उल्लंघन की शिकायत किससे कर सकते हैं?

पुलिस

कोई भी व्यक्ति पास के किसी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कर सकते हैं। आप वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार प्रतिष्ठान, उद्योग या व्यक्ति के खिलाफ सार्वजनिक उपद्रव1 के तहत एफआईआर भी दर्ज करा सकते हैं।

केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) भारत में जल और वायु प्रदूषण को रोकने और उसे नियंत्रित करने के लिए गठित एक निकाय है। यह निकाय पर्यावरण और वन मंत्रालय को तकनीकी सेवाएं देता है। साथ ही प्रदूषण के स्तर को विनियमित करने और कम करने में मदद करने के लिए वायु और जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम भी चलाता है। दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण की शिकायत करने के लिए यहां जाएं।

आप वायु प्रदूषण की शिकायत अपने राज्य के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कार्यालय या उसकी वेबसाइट पर जाकर कर सकते हैं।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की शाक्तियां कुछ इस तरह हैंः

  • बोर्ड औद्योगिक संयंत्रों से उत्सर्जन के बारे में जानकारी मांग सकता है, संयत्र के परिसर में प्रवेश और उसका निरीक्षण कर सकता है। औद्योगिक संयंत्रों से उत्सर्जन के नमूने लेकर उन्हें विश्लेषण के लिए भी भेज सकता है।
  • प्रदूषण फैलाने वाले प्रतिष्ठानों को बंद करने का निर्देश दे सकता है, ऐसे प्रतिष्ठानों की पानी या बिजली की आपूर्ति को काट या कम कर सकता है।
  • राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वायु प्रदूषण फैलाने से रोकने के लिए कोर्ट में जा सकता है।

कोर्ट

जिला अधिकारी

कोई भी व्यक्ति वकील की मदद से किसी भी सार्वजनिक उपद्रव के खिलाफ उपाय के लिए दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है। मजिस्ट्रेट के पास सेक्शन 152 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत प्रदूषणकारी गतिविधियों को रोकने के लिए 5 (उपद्रव हटाने का आदेश) नोटिस जारी करने की शक्ति है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल

प्रदूषण से जुड़ी शिकायतें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज की जा सकती हैं। ये शिकायतें एक व्यक्ति, अधिवक्ता, कानूनी फर्म या एनजीओ के प्रतिनिधि या भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दायर की जा सकती है।

जब कार्यवाही शुरू होती है, तो एनजीटी राहत और मुआवजा दे सकता है। साथ ही क्षतिग्रस्त संपत्ति और पर्यावरण क्षेत्र की वापसी और बहाली का आदेश दे सकता है। एनजीटी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले जिम्मेदार व्यक्ति से मृत्यु, विकलांगता, चोट या बीमारी, मजदूरी के नुकसान और मेडिकल खर्च के लिए मुआवज़ा देने का आदेश भी दे सकता है।

ट्रिब्यूनल के पास अनुदान देने की शक्ति भी है, जैसे-

  • अंतरिम आदेश या स्टे (रोक) देने की शक्ति
  • किसी व्यक्ति को रोकने और छोड़ने का आदेश देने की शक्ति

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव

‘शोर’ हमारे काम, आराम, नींद और संचार या बातचीत को बाधित कर सकता है। यह हमारी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है और अन्य मनोवैज्ञानिक, और संभवतः रोग संबंधी प्रक्रिया को जन्म दे सकता है। ध्वनि प्रदूषण के स्वास्थ्य पर कुछ बुरे प्रभाव नीचे दिए गए हैं:

बहरापन/ सुनाई न देना

बहरापन कुछ समय के लिए या हमेशा के लिए हो सकता है।

• Noise-Induced Temporary Threshold Shift (NITTS)-एन.आई.टी.टी.एस एक अस्थायी प्रकार का बहरापन है, जो तब होता है जब आप कुछ देर तक ऐसे स्थान पर रहते हैं जहां बहुत शोर हो रहा है।

• Noise-Induced Permanent Threshold Shift (NIPTS) एन.आई.पी.टी.एस एक स्थायी बहरापन है जो अपरिवर्तनीय हानि है। यह लंबे समय तक अत्यधिक शोरगुल वाले स्थान पर रहने के कारण होता है। एन.आई.पी.टी.एस.(NIPTS) आमतौर पर हाई फ्रीक्वेंसी रेडियो तरंगो के कारण होता है, सामान्य तौर बेहद खतरनाक होता है, यह लगभग 4000 हर्ट्ज़ (Hz) वाले तरंगों से होता है।

ये दोनों प्रकार के नुकसान कई बार प्रेसबायक्यूसिस के साथ हो सकते हैं। प्रेसबायक्यूसिस एक स्थायी बहरापन है जो हमारी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के साथ होती है।

संवाद (बातचीत) में बाधक

शोरगुल हमारे ‘बातचीत’ में भी हस्तक्षेप करता है। अगर शोरगुल और बातचीत दोनों एक साथ हों, तो दोनों में से कोई एक ध्वनि हमें सुनाई नहीं देती है। कई महत्वपूर्ण परिस्थितियों में शोरगुल बातचीत में बाधा डाल सकती है:

• व्यावसायिक स्थानों पर जहाँ कामगारों को चेतावनी के संकेत या चिल्लाने की आवाज़ न सुन पाने के कारण चोट लग सकती है।

• कार्यालयों, स्कूलों और घरों में जहाँ शोरगुल झुंझलाहट/परेशानी का एक प्रमुख कारण है।

नींद में खलल पड़ना

शोरगुल नींद में दखल दे सकता है और सो रहे लोगों को जगा सकता है, खासकर नवजात शिशुओं, वृद्ध आदि लोगों को।

झुंझलाहट

शोरगुल से होने वाली झुंझलाहट को उससे उत्पन्न होने वाली नाराजगी की भावना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। शोर से होने वाली झुंझलाहट शोर के शुरुआत होने के कुछ समय के बाद भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई लाउडस्पीकर आपके घर के पास 1 महीने से भी अधिक समय तक बजता है, तो एक समय के बाद आपको झुंझलाहट हो सकती है। हालांकि, हरेक व्यक्ति को शोर से होने वाली झुंझलाहट अलग-अलग कारणों पर निर्भर होता है, जैसे शोर के प्रति संवेदनशीलता या उसे सहन करने की क्षमता, आदि। उदाहरण के लिए, आप अपने घर के पास एक स्पीकर से आने वाले शोर या आवाज़ को तो सहन कर सकते हैं, लेकिन आपके बुजुर्ग दादा-दादी उसे शायद सहन नहीं कर सकते हैं।

काम-काज पर असर

शोर किसी व्यक्ति के ध्यानपूर्वक कार्य करने की क्षमता (अलर्टनेश) में बाधक हो सकता है और उसकी कार्य-क्षमता को बढ़ा या घटा सकता है। उदाहरण के लिए, चौकन्ना होकर कार्य करना, सूचना-संग्रह और विश्लेषण जैसी मानसिक गतिविधियाँ शोरगुल से प्रभावित हो सकती हैं।

शारीरिक क्रियाओं पर पड़ने वाला प्रभाव

‘रक्त वाहिकाओं’ पर शोर का अच्छा-खासा प्रभाव पड़ता है, खासकर छोटी वाली वाहिकाएं जिसे प्रिकैपिलियरी वेसेल्स कहते हैं। कुल मिलाकर, शोर इन रक्त वाहिकाओं को संकरा बना देता है। शोर के कारण पैर की उंगलियों, हाथ की उंगलियों, त्वचा और पेट के अंगों में जाने वाली रक्त वाहिकाएं (पेरिफेरल बल्ड वेसेल्स) सिकुड़ जाती हैं, जिससे शरीर के इन अंगों में सामान्य रूप से आपूर्ति की जाने वाली खून की मात्रा कम हो जाती है। रक्त वाहिकाएं जो मस्तिष्क को खून पहुँचाती है वह शोर के कारण फैलकर चौड़ी हो जाती हैं। यही कारण है कि लगातार तेज आवाज सुनने से सिरदर्द होता है। इन सबसे होने वाली कुछ स्वास्थ्य समस्याएं इस प्रकार हैं:

• गल्वानिक स्किन रेस्पोंस (GSR)-यह पसीने की ग्रंथियों से उत्पन्न होने वाला एक प्रकार का शारीरिक परिवर्तन है जो भावनात्मक स्थिति की तीव्रता को दर्शाता है। यह भावनात्मक स्थिति ध्वनि प्रदूषण के कारण भी संभव है।

• अल्सर से संबंधित गतिविधि में वृद्धि। लंबे समय तक चलने वाला शोर पेट में अल्सर की संभावना को बढ़ा सकता है, क्योंकि ध्वनि प्रदूषण गैस्ट्रिक जूस के प्रवाह को कम कर सकता है और पेट की अम्लता (एसिडिटी) को बदल सकता है।

• आंतों की गतिशीलता (मूवमेंट) में बदलाव आना जो कि पाचन तंत्र और उसके भीतर के भोज्य पदार्थों के चाल में कमी।

• कंकाल पेशी में तनाव का बदल जाना। दूसरे शब्दों में, मांसपेशियों के संकुचन/सिकुड़न से होने वाले दबाव में परिवर्तन होता है।

• ऊँची आवाज़ से संबंधित व्यक्तिपरक प्रतिक्रिया और चिड़चिड़ापन की धारणा

• सुगर, कोलेस्ट्रॉल और एड्रिनेलिन का बढ़ जाना

• हृदय गति में परिवर्तन होना

• रक्तचाप (बी.पी.) का बढ़ जाना

• वाहिकासंकीर्णन/रक्त वाहिकाओं में सिकुड़न। दूसरे शब्दों में, रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ जाना जिससे शरीर का रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) बढ़ जाता है। शोरगुल न केवल जागते समय सेहत के लिए हानिकारक होता है, बल्कि सोते समय या अचेतन स्थिति में भी शरीर पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

तनाव

शोर कई तरह से तनाव पैदा कर सकता है, जिसमें सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, पाचन विकार, और मनोवैज्ञानिक विकार शामिल हैं। उदाहरण के लिए, लगातार तेज आवाज़ या शोरगुल में रहने से आपको थकान हो सकता है।

अजन्मे शिशुओं और बच्चों पर प्रभाव

पेट में पलने वाला बच्चा शोरगुल से पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता है। शोर से बच्चे के विकास को जोखिम हो सकता है, जैसे कि जन्म के समय बच्चे का वजन कम होना या ज्यादा होना। शोरगुल वयस्कों या युवाओं को उतना प्रभावित नहीं करता है, लेकिन बच्चों पर इसका खासा प्रभाव पर सकता है, क्योंकि बच्चे अधिक संवेदनशील होते हैं। ध्वनि प्रदूषण के कारण बच्चों की पढ़ने की क्षमता, बोलने की क्षमता, भाषा और भाषा संबंधी कौशल प्रभावित हो सकता है।

वायु प्रदूषण कानूनों के तहत होने वाले अपराध और उनकी सजा

वायु प्रदूषण कानूनों के तहत होने वाले अपराध और उनकी सजा

अपराध कानून       सजा
 

वायु गुणवत्ता सीमा से ज्यादा वायु प्रदूषण करना

कानून, उद्योगों को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तय सीमा से ज्यादा वायु प्रदूषक को छोड़ने पर प्रतिबंध लगाता है। अगर वे ऐसा करते हैं, तो उद्योग के मालिक को जल्द ही राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सूचित और इसके लिए भुगतान करना होगा। एजेंसियां ​​हानिकारक उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने के लिए कोई भी सुधारात्मक उपाय प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के हिसाब से करती हैं।   

उस राज्य का राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपराधी को वायु प्रदूषण के उत्सर्जन से रोकने के लिए कोर्ट (मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट) में आवेदन कर सकता है।

प्रदूषण करने वाले व्यक्ति या उद्योग को प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राज्य विभागों द्वारा दी जाने वाली लागत ब्याज के साथ देनी होगी।

 

एक औद्योगिक संयंत्र को बिना उचित अनुमति के स्थापित करना या चलाना

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से बिना अनुमति लिए किसी औद्योगिक संयंत्र को स्थापित या संचालित करना एक अपराध है। कोई भी तय उत्सर्जन सीमा या उचित प्रदूषण नियंत्रण उपकरण से ज्यादा प्रदूषण करने पर अपराधी माना जाएगा।   

 

 

 

इसमें जुर्माने के साथ डेढ़ साल से छह साल तक की जेल की सजा है। अगर उल्लंघन जारी रहता है, तो जुर्माना की रकम बढ़ सकती है, जो इसे जारी रखने वाले हर दिन के लिए 5,000 रूपये (अधिकतम) लगाई जा सकती है।

अगर प्रदूषण एक साल से ज्यादा समय तक जारी रहता है, तो अपराधी को जुर्माने के साथ दो से सात साल तक की जेल भी हो सकती है।

 

असुरक्षित स्थिति में वाहन (गाड़ी) का  इस्तेमाल

अगर कोई ऐसा वाहन सार्वजनिक जगह पर चलाया जाता है, जो ध्वनि और वायु प्रदूषण के निर्धारित मानकों का उल्लंघन करता है, तो यह एक दंडनीय अपराध है।    पहली बार के अपराध के लिए 1,000 रुपये का जुर्माना होगा। वहीं दूसरे बार के अपराध के लिए 2,000 रुपये का जुर्माना होगा।
 

पीयूसी (प्रदूषण नियंत्रण में) प्रमाणपत्र का उल्लंघन

 

मोटर वाहन का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति अगर मंत्रालय द्वारा जारी वैध पीयूसी (प्रदूषण नियंत्रण) प्रमाण पत्र नहीं ले रहा हैं, तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। 

इसकी सजा 10,000 रुपये का जुर्माना है। 
 

पर्यावरण प्रदूषण: वायु, जल या भूमि का प्रदूषण

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन यानी वायु, जल या भूमि का प्रदूषण या पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचाना अपराध है।  

सजा 5 साल तक की जेल के साथ जुर्माना है, जो 1,00,000 रुपये तक बढ़ सकता है। कानून का लगातार उल्लंघन होने पर 5,000 रुपये का हर दिन के लिए अतिरिक्त जुर्माना लगेगा। 

 

पर्यावरण में हानिकारक प्रदूषकों को छोड़ना 

 

 

पर्यावरण में हानिकारक प्रदूषकों को छोड़ना सार्वजनिक उपद्रव वाला अपराध है, क्योंकि ये प्रदूषक हवा को जहरीला बनाते हैं और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। यहां तक ​​कि सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करना भी सार्वजनिक उपद्रव माना जाता है।  

सजा 500 रुपये का जुर्माना है। 
 

ऐसी गतिविधियों में शामिल होना, जो समुदाय के स्वास्थ्य और शारीरिक आराम के लिए खतरनाक हो

 

ऐसे उद्योगों और दूसरे ऐसी प्रक्रियाएं, जो वायु प्रदूषकों को हवा में छोड़ती हैं और हानिकारक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ लोगों को असुविधा पहुंचाती हैं, वह अपराध है। इसमें ऐसे व्यापार या व्यवसाय भी शामिल है, जो हानिकारक है और लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है और उनकी शारीरिक परेशानी के लिए खतरा हो। 

ऐसे उपद्रव (नुकसान पहुंचाने वाले काम) को रोकने के लिए मजिस्ट्रेट आदेश पारित कर सकता है।

 

अगर वायु प्रदूषण सरकारी विभागों के कारण हो, तो क्या होता है?

जब किसी सरकारी विभाग द्वारा कोई अपराध किया जाता है, तो उस विभाग के प्रमुख या प्रमुखों को उस विशेष अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है। इसके अलावा, अगर यह सिद्ध हो जाता है कि अपराध विभाग प्रमुख ने नहीं किया बल्कि उस विभाग के किसी अधिकारी की सहमति, संलिप्तता या लापरवाही से किया गया है, तो इस स्थिति में अपराध के लिए उस अधिकारी को जिम्मेदार माना जाएगा। वायु प्रदूषण कानूनों के तहत होने वाले अपराध और उनकी सजा के बारे में पढ़ें।

अगर अपराध बिना जानकारी के या अपराध से बचने के लिए सभी सावधानियां बरतने के बाद होता है, तो इस स्थिति में भी विभाग प्रमुख को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा।