LGBTQ+ व्यक्तियों द्वारा एक प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज कराना

जब आप शिकायत दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन जाते हैं, तो शिकायत का विवरण एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट-प्राथिमिकी) के रूप में लिखा जाता है।

प्राथिमिकी (एफआईआर) को दर्ज करना पुलिस अधिकारी का काम है, और यदि आप एक महिला या पारमहिला (ट्रांसवुमन) हैं, तो कुछ अपराधों के लिए, एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज करना होगा।

एक प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज करने से पहले, किसी वकील से सलाह लें और देखें कि किस तरह के अपराधों के लिए आप एक प्राथिमिकी दर्ज करा सकते हैं क्योंकि कुछ अपराधों के लिए प्राथिमिकी सिर्फ महिलाओं या पारमहिला (ट्रांसवुमन) द्वारा ही दर्ज कराई जा सकती हैं, पुरुष द्वारा नहीं। यदि आप प्राथिमिकी दर्ज कराते समय किसी भी कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो यहां देखें कि आप कौन कौन से कदम उठा सकते हैं।

दहेज की मांग से जुड़ी क्रूरता और मौतें


भारतीय कानून दहेज की मांग के कारण होने वाली क्रूरता और मौत को अपराध मानता है। इसे दहेज हत्या कहा जाता है। अगर पत्नी की मौत दहेज की मांग के उत्पीड़न की वजह से हुई है, तो महिला के पति और ससुराल वालों को सजा दी जा सकती है।


दहेज से जुड़ी क्रूरता और उत्पीड़न के मामलों में, आप पुलिस स्टेशन जाकर एफआईआर दर्ज करके इसकी रिपोर्ट कर सकते हैं।


दोषी पाए जाने पर पति और ससुराल वालों को 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

बलात्कार का मुकदमा

बलात्कार के अपराध की जांच और सुनवाई कैमरे के सामने की जाती है,और मुकदमा जनता के लिए नहीं खुला होता है। हालांकि, किसी भी एक पक्ष के आवेदन करने पर न्यायाधीश किसी व्यक्ति को अदालत के मुकदमे में रहने  या उसका निरीक्षण करने की अनुमति दे सकता है। जहाँ तक संभव हो, ऐसे केस के मुकदमाें की न्यायाधीश एक महिला होती है।

बलात्कार के कुछ मामलों में, जहां संभोग हुआ है, ये साबित हो जाता है और सर्वाइवर कहती है कि उसने सहमति नहीं दी। इस स्थिति में कोर्ट कानूनी रूप से मानती है कि सर्वाइवर ने सहमति नहीं दी थी। फिर, यह आरोपी व्यक्ति के वकील पर निर्भर करता है कि साबित करे कि पीड़िता ने सहमति दी थी और संभोग सहमति से हुआ है। 

चार्जशीट दाखिल करने की तारीख से दो महीने के भीतर जांच या ट्रायल पूरा हो जाना चाहिए।

भारत में एसिड की बिक्री को कैसे नियंत्रित किया जाता है?

भारत में एसिड की बिक्री, नियामक तंत्र के दो स्तरों द्वारा नियंत्रित होती है:

संबंधित राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सरकारों द्वारा बनाए गए राज्य स्तरीय नियमों से 

छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश सहित एसिड की बिक्री के लिए विभिन्न राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों ने नियम बनाए हैं। ये नियम मोटे तौर पर समान हैं, और एसिड बेचने वाले दुकानदारों के लिए विभिन्न आवश्यकताओं को निर्धारित करते हैं:

1. दुकानदार केवल एसिड बेच सकते हैं, या बिक्री के लिए तभी रख सकते हैं, जब उनके पास संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण द्वारा जारी लाइसेंस हो। इसका मतलब यह प्राधिकारी जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कोई अन्य अधिकारी हो सकता है।

2. यदि किसी दुकानदार का लाइसेंस अमान्य हो जाता है, तो उन्हें 3 महीने के भीतर दूसरे लाइसेंस धारक को एसिड बेचना होगा। इस अवधि के बाद, लाइसेंसिंग प्राधिकारी को इसे हटाना और नष्ट करना होता है।

3. दुकानदारों को अपने व्यवसाय के स्थान पर उस राज्य के एसिड नियमों की बिक्री की एक कॉपी प्रदर्शित करनी होगी।

4. दुकानदारों को केवल उन्हीं परिसरों से एसिड बेचना चाहिए, जो लाइसेंस में निर्दिष्ट किए गए हैं। उदाहरण के लिए, दुकानदार अपने केवल एक ही दुकान में एसिड की बिक्री कर सकता है, न कि अन्य किसी दुकान में जिसका लाइसेंस में उल्लेख नहीं है।

5. दुकानदारों को केवल उन्ही लोगों को एसिड बेचना चाहिए जिन्हें वह व्यक्तिगत रूप से जानता है, या जो अपने पते के साथ एक फोटो पहचान-पत्र दिखाते हैं और आधार कार्ड जैसे कानूनी रूप से वैध पते के प्रमाण के साथ इसकी पुष्टि करते हैं।

6. दुकानदारों को एसिड खरीदने वाले का नाम, फोन नंबर, पता और एसिड खरीदने का मकसद पता करने के बाद ही एसिड बेचना चाहिए. उन्हें एसिड बिक्री लेनदेन के निर्धारित विवरण के साथ एक रजिस्टर रखना होगा, जिसमें एसिड का नाम, बेची गई मात्रा आदि शामिल हैं।

7. दुकानदारों को 18 साल से कम उम्र के लोगों को एसिड नहीं बेचना चाहिए।

8. दुकानदारों को एसिड को एक बॉक्स/कमरे आदि में सुरक्षित रूप से स्टोर करना चाहिए, जिस पर ‘जहर’ लिखा हो, और यह सुनिश्चित करें कि वहां केवल एसिड ही रखा जाए। उन्हें सुरक्षित रूप से पैकिंग और लेबल लगाने के बाद ही एसिड बेचना चाहिए।

यदि कोई दुकानदार पहली बार इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो 3 महीने तक की जेल की सजा दी जा सकती है, या 500 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों लगाएं जा सकते हैं। अपराध को दोहराने पर 6 महीने तक की अवधि की जेल है, या 1000 रुपये का जुर्माना, या दोनों लगाए जा सकते हैं। इसलिए, उनके खिलाफ एसिड की अवैध बिक्री के लिए आपराधिक शिकायत या एफआईआर दर्ज की जा सकती है। ऐसा एसिड, जो अवैध रूप से जमा किया गया है, उसे भी दुकानदार के पास से जब्त कर लिया जाएगा।

भारत सरकार ने संबंधित नियम बनाते समय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए मॉडल नियम(जहर रखने और बिक्री नियम, 2013) भी बनाए हैं, ताकि उसे संदर्भित किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को अपने नियमों को इन मॉडल नियमों के जैसे ही सख्त बनाने के लिए अनिवार्य किया है। इसके अलावा, कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से बार-बार आग्रह किया है कि वे एसिड और अन्य नाशक पदार्थों की बिक्री को विनियमित करने के लिए नियम बनाएं, और उसका उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करें।

सुप्रीम कोर्ट के नियम 

सुप्रीम कोर्ट ने एसिड की बिक्री के बारे में दिशा-निर्देश दिए हैं ताकि जिन राज्यों में एसिड की बिक्री के लिए राज्य के नियम नहीं थे वहां उनका पालन हो सके। इन दिशानिर्देशों के तहत, दुकानदारों को निम्नलिखित नियमों का पालन करना होगा:

• यदि वे खरीदार के विवरण, उनके पते और बेची गई मात्रा के साथ एक रजिस्टर बनाए रखते हैं वे तभी एसिड की ओवर-द-काउंटर बिक्री कर सकते हैं।

• उन्हें एसिड तभी बेचना चाहिए जब खरीदार व्यक्ति अपने पते के साथ सरकार द्वारा जारी फोटो आईडी दिखाता है, और एसिड खरीदने का कारण बताता है।

• उन्हें जिले के सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) को 15 दिनों के भीतर अपने एसिड के स्टॉक की घोषणा करनी होगी।

• उन्हें नाबालिगों को एसिड नहीं बेचना चाहिए।

इन न्यायालय दिशानिर्देशों के तहत, कोई व्यक्ति जिले के सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) को भी शिकायत कर सकता है क्योंकि दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करने की उनकी जिम्मेदारी है और वे ऊपर दिए गए नियमों का उल्लंघन करने वाले दुकानदारों पर जुर्माना लगा सकते हैं।

साइबर स्टाकिंग क्या है?

[जारी चेतावनी: इस लेख में शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा, दुर्व्यवहार और गाली-गलौज के बारे में जानकारी है जो कुछ पाठकों को विचलित कर सकती है। 

यदि कोई व्यक्ति ईमेल, सोशल नेटवर्क और व्हाट्सएप आदि जैसे इंस्टेंट मैसेजिंग एप्लिकेशन के माध्यम से इंटरनेट पर किसी महिला की गतिविधि पर लगातार नजर रखता है या उसका पीछा करता है या फॉलो करता है, तो यह साइबर स्टाकिंग का अपराध है।

साइबर स्टाकिंग के कुछ सामान्य रूप हैं, जैसे:

• सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर किसी व्यक्ति के द्वारा लगातार संपर्क करना, उदाहरण के लिए, व्हाट्सएप और फेसबुक।

• किसी की सभी व्यक्तिगत जानकारी और तस्वीरें प्राप्त करने के लिए और उनके खिलाफ इसका इस्तेमाल करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना।

• अश्लील फोटो और वीडियो, धमकियों और गालियों के साथ नग्न या विकृत चित्रों को प्रदर्शित करने वाला ईमेल भेजना।

• इंटरनेट पर या अश्लील वेबसाइट पर किसी की अश्लील/नग्न तस्वीरें पोस्ट करना।

• कंप्यूटर के वेबकैम या कंप्यूटर डिवाइस तक पहुंच कर किसी महिला की गतिविधि की निगरानी करना।

ऑनलाइन स्टाकिंग के लिए जुर्माने के साथ तीन साल तक की जेल की सजा है। बार-बार अपराध करने वालों के लिए, यह सजा और अधिक है, यानी जुर्माने के साथ पांच साल तक की जेल।

दुकानों से सामान चोरी करना (शॉपलिफ्टिंग)

शॉपलिफ्टिंग का तात्पर्य किसी दुकान या स्टोर से वस्तुओं की चोरी करना और उनके लिए भुगतान नहीं करना है। उदाहरण के लिए, राम और श्याम चॉकलेट चोरी करने के लिए एक किराने की दुकान पर जाते हैं और बिना भुगतान किए भाग जाते हैं।

भारत में, शॉपलिफ्टिंग को चोरी पर सामान्य कानून शासित किया जाता है। चोरी क्या है और इसकी क्या सजा है, जानने के लिए यहां और पढ़ें। यदि आपने शॉपलिफ्टिंग का अनुभव किया है, तो शिकायत करने के लिए आप जो कदम उठा सकते हैं, यह समझने के लिए यहां पढ़ें।

बाल यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करना

अगर आपको पता चलता है कि कहीं बाल यौन दुराचार हो रहा है, तो आपको पुलिस को इसकी रिपोर्ट करनी होगी, जो आपके शिकायत को लिखित रूप में दर्ज करेगा। यदि आप जान कर भी रिपोर्ट नहीं करते हैं, तो आपको जुर्माने के साथ 6 महीने के जेल की सजा दी जा सकती है। यदि आप किसी भी घटना से अवगत हैं और आप बहुत हद तक निश्चित हैं कि कोई बच्चा किसी प्रकार के यौन उत्पीड़न का शिकार है, तो कृपया बच्चे की मदद करने के लिए किसी अधिकारी से संपर्क करने के लिए उल्लेखित तरीकों का प्रयोग करें। इसके लिये अधिकारी तक पहुंचने के कई तरीके हैं, इसलिए आप के लिये जो सबसे ज्यादा उपयुक्त तरीका हो उसका उपयोग करें।

आप किसी भी तरीके से शिकायत कर सकते हैं:

ऑनलाइन:

सरकार की एक ऑनलाइन शिकायत प्रणाली है जहां आप अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। आपकी शिकायत ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ (नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स) को दायर की जाएगी।

फोन के जरिए:

आप निम्नलिखित टेलीफोन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं: -‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’-9868235077 -‘चाइल्डलाइन’ (चाइल्डलाइन बच्चों के खिलाफ किए गए अपराधों के लिए एक हेल्पलाइन है) -1098

ईमेल के जरियेः

आप pocsoebox-ncpcr@gov.in पर एक ईमेल भेज सकते हैं

पुलिस:

बाल यौन उत्पीड़न की किसी भी घटना के बारे में आपके पास जो भी जानकारी है, उसके बारे में पुलिस से संपर्क करने के लिए 100 नंबर पर कॉल करें।

मोबाइल ऐप्प:

आप POCSO e-box (केवल एंड्रॉयड यूजर्स के लिये) नामक मोबाइल ऐप्प डाउनलोड कर सकते हैं और सीधे इसके माध्यम से उत्पीड़न की रिपोर्ट कर सकते हैं।

पोस्ट / पत्र / ‘मैसेंजर’ के माध्यम से:

आप अपनी शिकायत के साथ ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ को लिख सकते हैं या इस पते पर एक ‘मैसेंजर’ भेज सकते हैं:

'राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग' (नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स, एनसीपीसीआर) 
5 वाँ तल, चंद्रलोक बिल्डिंग 36, जनपथ, नई दिल्ली -110001 भारत।

जब आपने शिकायत कर दी तो बच्चे के साथ क्या होगा इसके बारे में आप चिंतित न हों। बच्चे की स्थानीय पुलिस / ‘विशेष किशोर पुलिस’ (स्पेशल जुवेनाइल पुलिस) के द्वारा देखभाल की जाएगी जो ‘बाल कल्याण समिति (चाइल्ड वेलफेयर कमेटी) को सूचित करेगी, जो शिकायत मिलने के बाद, बच्चे और बच्चे के परिवार को कानूनी प्रक्रिया में सहायता करने के लिए एक ‘सहायक व्यक्ति’ (सपोर्ट परसन) की नियुक्ति करेगी।

LGBTQ+ व्यक्तियों द्वारा एक प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज कराते वक्त होने वाली कठिनाइयां

यदि कोई पुलिस अधिकारी आपके यौन अभिविन्यास या लिंग पहचान के कारण आपकी प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज करने से इनकार करता है, या आपको परेशान करता है, तो आप नीचे दिए गए कदम उठा सकते हैं:

  • एक लिखित शिकायत पुलिस अधीक्षक (एसपी) को करें। पुलिस अधीक्षक खुद जांच कर सकते हैं, या वे अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को कार्रवाई करने का आदेश दे सकते हैं।
  • पुलिस स्टेशन जाते समय किसी वकील की मदद लें। यह बेहद उपयोगी है क्योंकि वकील आपकी ओर से वकालत करने में सक्षम होते हैं, और उनके साथ रहने से पुलिस अधिकारियों द्वारा आपके साथ होने वाले उत्पीड़न की संभावना कम रहेगी।
  • एक प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज करने के लिए, पास के किसी अन्य पुलिस स्टेशन पर जाएं। इसे जीरो प्राथिमिकी (एफआईआर) के रूप में जाना जाता है, जिसमें किसी भी पुलिस स्टेशन में प्राथिमिकी दर्ज की जा सकती है, और दी गई जानकारियों को पुलिस अधिकारियों द्वारा अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड करना होता है, और फिर इसे उस पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित करना होता है, जिसके क्षेत्र / क्षेत्राधिकार में यह अपराध हुआ है।
  • किसी और को अपनी ओर से प्राथिमिकी (एफआईआर) दर्ज कराने का अनुरोध करें। आप उस व्यक्ति को, आपके साथ हुई हिंसा / उत्पीड़न का विवरण दे सकते हैं।
  • ’निजी शिकायत’ दर्ज कराने के लिए सीधे जिला / न्यायिक मजिस्ट्रेट से संपर्क करें, लेकिन पुलिस के पास जाने के बाद ही।
  • राष्ट्रीय / राज्य मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय / राज्य महिला आयोग जैसे अन्य शिकायती फोरम की मदद लें, जो न केवल पुलिस से संपर्क करने में आपकी सहायता करेंगे, बल्कि हिंसा / उत्पीड़न की घटनाओं को भी देखेंगे।

क्रूरता और दहेज के मामलों में गिरफ्तारी के लिए दिशानिर्देश

क्रूरता और दहेज के मामलों में गलत गिरफ्तारी और कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों की जांच करते समय पुलिस के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन्हें बाद में, गृह मंत्रालय द्वारा एक एडवाइज़री सर्कुलर यानी परामर्श परिपत्र के रूप में जारी किया गया।

पुलिस

  • क्रूरता का मामला दर्ज होने पर पुलिस को पति या ससुराल वालों को एक-दम से गिरफ्तार नहीं करना चाहिए।
  • बिना वारंट के गिरफ्तारी के लिए पुलिस के पास संतोषजनक कारण होना चाहिए।
  • सभी पुलिस अधिकारियों को एक चेकलिस्ट दी जानी चाहिए जिस में कुछ खास प्रक्रियाएं शामिल हों, जिनके हिसाब से जांच की जाए। पुलिस को आरोपी को जेल में और रखने के लिए पेश करते समय उन कारणों और सामग्रियों के साथ भरी हुई चेकलिस्ट मजिस्ट्रेट को भेजनी चाहिए, जिसके कारण गिरफ्तारी की जरूरत हुई।
  • क्रूरता के आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार न करने के पुलिस के फैसले को उस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होने की तारीख से दो हफ्ते के अन्दर मजिस्ट्रेट को भेज दिया जाना चाहिए।
  • इन निर्देशों का पालन नहीं करने वाले पुलिस अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई होगी। साथ ही  वह उच्च न्यायालय द्वारा अदालत की अवमानना ​​​​के लिए भी दंडित किए जाएंगे।

मजिस्ट्रेट

  • मजिस्ट्रेट को आरोपी की हिरासत को तभी अधिकृत करना होता है, जब वह पुलिस रिपोर्ट में गिरफ्तारी के कारणों को पढ़ ले और वह कारण वैध हो और वह उनसे संतुष्ट हो।
  • अगर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट ऊपर बताए कारण दर्ज किए बिना हिरासत को अधिकृत करते हैं, तो उन पर भी उपयुक्त उच्च न्यायालय द्वारा विभागीय कार्रवाई होगी।

चोरी के दौरान हिंसा का सामना

अगर कोई चोरी करते समय हथियारों के साथ या हथियारों के बिना हिंसा करता है, तो सजा ज्यादा होगी। कानून के तहत इसे डकैती कहा जाता है। डकैती के लिए 10 साल तक जेल की सजा और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

जब चोर स्वेच्छा से आपकी मृत्यु का कारण बनता है / आपको मारने का प्रयास करता है, आपको रोकता है, आपको चोट पहुँचाता है, या आपको किसी चोट से डराता है, तो यह डकैती है।

चोरी करते समय, चोरी करने के लिए, चोरी के सामान को ले जाने का प्रयास करने या ले जाने के दौरान यदि हिंसा होती है, तब भी यह डकैती का अपराध है।

अगर आपको चोरी के दौरान हिंसा का सामना करना पड़ा है, तो शिकायत करने के लिए आप जो कदम उठा सकते हैं, उन्हें समझने के लिए यहां पढ़ें।