बाल विवाह कराना

बाल विवाह कराना भी एक अपराध है:

• विवाह कराना: कोई भी व्यक्ति जो बाल विवाह कराता है या कराने में मदद करता है, वह अपराधी माना जायेगा।

• विवाह कराने वाले माता-पिता/ सरंक्षक: यदि कोई माता-पिता, या कोई सरंक्षक या कोई भी ऐसा व्यक्ति जिस पर किसी भी बच्चे की ज़िम्मेदारी है किसी भी तौर पर बाल विवाह को बढ़ावा देता है या उसका हिस्सा बनता है तो उसके इस कृत्य को अपराध माना जाएगा। किसी भी बाल विवाह में सम्मिलित होना या उसमें भाग लेने को भी एक अपराध माना जायेगा।

जो कोई भी इन अपराधों को करने का दोषी पाया जायेगा उसे दो साल के कठोर कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने की सज़्ज़ा दी जाएगी।

इस कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय और अजमानतीय हैं, जिसका अर्थ है कि पुलिस आपको बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और पुलिस से जमानत प्राप्त करना आपका हक नहीं होगा।

अनियमित ईसाई विवाह क्या हैं?

अनियमित विवाह वे विवाह होते हैं जिनमें कुछ शर्तों का पालन नहीं किया जाता है। आमतौर पर ऐसी शादियों को शुरू से ही अमान्य माना जाता है, हालांकि कानून कहता है कि अनियमितता की स्थिति में विवाह को अमान्य नहीं किया जाएगा, बल्कि इसे सुधारा जाएगा। नीचे कुछ कारण दिए गए हैं जिनके कारण विवाह अनियमित हो सकता है। इनमें से कुछ त्रुटियां निम्नलिखित हो सकती हैं:

• किसी भी विवरण में विवाहित व्यक्तियों के निवास स्थान के संबंध में

• किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा दी गई सहमति के किसी भी रूप में, जिसकी ऐसे विवाह के लिए सहमति कानून द्वारा आवश्यक है।

• विवाह का नोटिस में।

• प्रमाण-पत्र में।

• जिस समय और स्थान पर विवाह संपन्न हुआ था।

• विवाह के पंजीकरण में।

 

यदि पति / पत्नी हिंदू विवाह कानून के तहत तलाक चाहता / चाहती है

कभी-कभी विवाह में, आप कुछ परिस्थितियों के कारण तलाक चाहते हैं (जबकि आपका जीवनसाथी नहीं)। यदि इन परिस्थितियों में कानून के तहत क्रूरता, मानसिक बीमारी आदि आती है, तो आप अपनी सुनवाई के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं।

आपका जीवनसाथी इन कारणों से इनकार कर सकता है और न्यायालय को बता सकता है कि वह तलाक क्यों नहीं चाहता है।

कानून के तहत आप शादी के एक साल बाद ही तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं।

एक साल की अवधि

अगर आप अपने जीवनसाथी के खिलाफ तलाक फाइल करना चाहते हैं, तो कानून के तहत आपको तलाक के लिए फाइल करने के लिए शादी की तारीख से एक साल की अवधि तक इंतजार करना होगा।

उदाहरण के लिए, यदि जितेंद्र और वाहिदा की शादी 9 जनवरी, 2018 को हुई है, तो जितेंद्र को वाहिदा के खिलाफ तलाक फाइल करने के लिए कम से कम 9 जनवरी, 2019 तक इंतजार करना होगा।

एक वर्ष की अवधि के अपवाद

यद्यपि कानून एक वर्ष की प्रतीक्षा अवधि देता है, ऐसे कुछ कारण हैं जिनके द्वारा पक्ष इस समय सीमा से पहले न्यायालय जा सकते हैं, जैसे:

• जीवनसाथी में से किसी एक को असाधारण कठिनाई। उदाहरण के लिए, यदि आपका पति या पत्नी हर दिन आपको शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है, तो आप तलाक की अर्जी दाखिल करने के लिए कोर्ट जा सकते हैं।

• जीवनसाथीमें से किसी एक के लिए असाधारण भ्रष्टता। उदाहरण के लिए, यदि आपका पति या आपकी पत्नी आपको अपमानजनक यौन कार्य करने के लिए कह रहे हैं।

 

इस्लामी निकाह के लिए प्रस्ताव और स्वीकृति की क्या जरूरत है?

किसी एक पक्ष द्वारा या उसकी ओर से निकाह का प्रस्ताव दिया जाना चाहिए और दूसरे पक्ष द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकार किया जाना चाहिए । दूल्हा और दुल्हन दोनों को एजब ए क़ुबूल (क़ुबूल है) कहना होगा, जिसका अर्थ है “मैं सहमत हूं”।

निकाह की रस्म के दौरान यह उनकी अपनी इच्छा से और स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए। प्रस्ताव और स्वीकृति की प्रक्रिया एक ही बैठक में की जानी चाहिए, यानी, एक बैठक में दिया गया प्रस्ताव और दूसरी बैठक में की गई स्वीकृति से वैध निकाह का गठन नहीं होगा।

कौन गोद ले सकता है?

गैर-धार्मिक कानून के तहत गोद लेना

गैर-धार्मिक कानून के तहत गोद लेने के लिए, आपको संभावित यानी होने वाले माता-पिता बनने के लिए कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं:

स्वास्थ्य

• आपको शारीरिक रूप से फिट होना चाहिए यानी आपको कोई जानलेवा बीमारी न हो।

• आपको आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत होना चाहिए और बच्चे को गोद लेने के बाद उसको अच्छी परवरिश देने का पूरा इरादा  होना चाहिए।

वैवाहिक स्थिति (आपकी शादी हुई है या नहीं )

• गोद लेने वाले अकेले माता/पिता: इसमें आपकी शादी हुई है या नहीं, या आपके पहले से बच्चे हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता यानी एक अकेला/तलाकशुदा/शादीशुदा व्यक्ति भी बच्चे को गोद ले सकता है। अगर आप एक लड़की को गोद लेना चाहते हैं, तो आपको एक महिला होना चाहिए। एक अकेली महिला लड़का और लड़की दोनों बच्चों को गोद ले सकती है। जबकि, एक अकेला पुरुष एक लड़की को गोद नहीं ले सकता है। 

• गोद लेने वाले शादीशुदा माता-पिता: शादीशुदा जोड़े के मामलों में, पति-पत्नी दोनों को गोद लेने के लिए सहमति देनी होती है। साथ ही, उनका रिश्ता कम से कम 2 साल से स्थिर और मजबूत होना चाहिए।

मौजूदा बच्चे (अगर पहले से आपके बच्चे हैं)

जिन पति-पत्नी के पहले से 3 या उससे ज़्यादा बच्चे हैं, उन्हें बच्चा गोद लेने की इजाज़त नहीं है। लेकिन कुछ खास मामलों में छूट है, जैसे- खास  देखभाल की जरूरत वाले बच्चे, ऐसे बच्चे जिन्हें लंबे समय से कोई गोद नहीं ले रहा या जब बच्चे के सौतेले माता-पिता या रिश्तेदार बच्चे को गोद ले रहे हों।

उम्र

बच्चे और उसे गोद लेने वाले माता-पिता के बीच कम से कम 25 साल उम्र का अन्तर होना चाहिए।

• सौतेले माता-पिता और रिश्तेदारों वाले गोद लेने के मामलों को छोड़कर,अलग-अलग उम्र के बच्चों को गोद लेने के लिए पति-पत्नी की कुल (जोड़कर) उम्र देखी जाती है।यह समझने के लिए नीचे दी गई तालिका देखें कि आप किस उम्र के बच्चे को गोद ले सकते हैं।

 

बच्चे की उम्र गोद लेने वाले माता-पिता (पति-पत्नी) की मिलाकर अधिकतम उम्र, जिसके अंदर वे बच्चे को गोद ले सकते हैं। गोद लेने वाले अकेले माता/पिता की अधिकतम उम्र, जिसके अंदर ही वे बच्चे को गोद ले सकते हैं।
4 साल तक 90 साल 45 साल
4 साल से लेकर 8 साल तक 100 साल 50 साल
8 साल से लेकर 18 साल तक 110 साल 55 साल

 

हिंदू कानून के तहत गोद लेना

हिंदू कानून के तहत गोद लेने के लिए, आपको बच्चे का माता-पिता बनने के लिए कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं।

हिंदू कानून के तहत, एक हिंदू पुरुष या महिला किसी हिंदू बच्चा या बच्ची को गोद ले सकते हैं। 

एक हिन्दू पुरुष जो एक बच्ची को गोद लेता है, तो वह उससे कम से कम 21 साल बड़ा होना चाहिए। इसी तरह,अगर एक हिंदू महिला जो एक बच्चा (लड़के) को गोद लेती है, वह उससे कम से कम 21 साल बड़ी होनी चाहिए।

हिन्‍दू दत्तक भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत गोद लेने के लिए, आपको कुछ तय शर्तें को भी पूरा करना होता है:

उम्र

• आपकी उम्र 18 साल से ज़्यादा हो और आप मानसिक रूप से स्वस्थ हो।

वैवाहिक स्थिति यानी आप शादीशुदा हैं या नहीं

• गोद लेने वाले शादीशुदा माता-पिता: अगर आप शादीशुदा हैं, तो बच्चे को गोद लेने के लिए आपको आपकी पत्नी या पति की सहमति लेनी होती है। लेकिन अगर आपका जीवनसाथी मानसिक रूप से कमजोर हो, या फिर उसकी मृत्यु हो चुकी हो, या अब वह हिंदू न हो। इस स्थिति में उसकी सहमति जरूरी नहीं होती है।

अगर एक ही पत्नी है, तो वही बच्चे की गोद लेने वाली माँ मानी जाएगी। वहीं अगर एक से ज्यादा पत्नियां हैं, तो सबसे बड़ी पत्नी को गोद लेने वाली माँ माना जाएगा और बाकी पत्नियां बच्चे की सौतेली माँ ही होंगी।

• गोद लेने वाले अकेले माता/पिता: अगर आप शादीशुदा नहीं है या फिर विधवा/विधुर हैं, तो आप एक बच्चे को गोद ले सकते हैं।  अगर आप बाद में शादी करते हैं, तो आपका जीवनसाथी उस बच्चे का सौतेला पिता या सौतेली माँ माना जाएगा।

मौजूदा बच्चे (अगर पहले से आपके बच्चे हैं)

• अगर आप एक लड़की को गोद ले रहे हैं, तो आपके पास  पहले से कोई जीवित हिंदू बेटी या पोती (अपनी या सौतेली) नहीं होनी चाहिए। इसी तरह, अगर आप एक लड़के को गोद ले रहे हैं, तो आपके पास कोई जीवित हिंदू बेटा, पोता या परपोता (अपना या सौतेला) नहीं होना चाहिए।

 

बातिल और फासीद शादियां

मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, नियमों के उल्लंघन में विवाह को बातिल विवाह के रूप में जाना जाता है। वे विवाह जो आत्मीयता, पालन-पोषण आदि की शर्तों को भंग करते हैं, बातिल विवाह के उदाहरण हैं (जैसे, अपनी माँ की बहन से शादी करना)। किसी भी विवाह को अमान्य घोषित करने का एक और तरीका बातिल है। एक विवाह को रद्द किया जा सकता है अगर वह शून्य है और इसके मायने हैं कि विवाह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। कुछ परिस्थितियों में, आपकी शादी को फासीद या अनियमित माना जा सकता है। ये प्रतिबंध अस्थायी हैं या आकस्मिक परिस्थितियों का परिणाम हैं-आम तौर पर अनियमित विवाहों को सुधारना संभव है (जैसे, बिना गवाहों के विवाह)।

भरण-पोषण की कुल राशि / निर्वाह व्यय

भरण-पोषण के तौर पर दी जाने वाली कोई मानक राशि नहीं है। यह मामले के आधार पर तय किया जाता है। आपको ‘निर्वाह व्यय’ के लिये मिलने वाली राशि, न्यायालय कई तरह के कारकों में लेते हुए तय करेगी जैसेः

  • समर्थक / सहायक एवं आश्रितों की सामाजिक स्थिति एवं जीवन स्तर।
  • आपकी जरूरतें और आवश्यकताएं (यथोचित गणना)।
  • अगर आप अपने सहायक से अलग रह रहे हैं
  • सहायक की सभी संपत्तियों की आय, धन और मूल्य।
  • आपकी सभी संपत्तियों की आय, धन और मूल्य।
  • ऐसे व्यक्तियों की संख्या जिन्हें भरण-पोषण की रकम (निर्वाह व्यय) मिलनी है।

न्यायाधीश भरण-पोषण भत्ता देने की काल-अवधि तय करेगा, लेकिन ज्यादातर मामलों में आमतौर पर यह काल-अवधि, व्यक्ति की पूरी जिंदगी के लिए होती है।

हिंदू विवाह के लिए कम से कम आयु

कानून की नजर में हिंदू विवाह को वैध मानने के लिए, शादी के समय दुल्हे की आयु 21 वर्ष से ज्यादा और दुल्हन की आयु 18 वर्ष से ज्यादा हो जानी चाहिए।

इस शर्त को पूरा ना करने की सजा सामान्य कारावास है जिसे पंद्रह दिनों तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना है जिसे बढ़ाकर एक हजार रुपये तक किया जा सकता है।

इस्लामी निकाह में तलाक के लिए पत्नी द्वारा कोर्ट का दरवाजा खटखटाना

जीवनसाथी को तलाक देने के लिए कोर्ट जाने का प्रावधान केवल महिलाओं के लिए उपलब्ध है। कानून आपको निम्नलिखित कारणों से अपने पति को तलाक देने के लिए न्यायालय जाने की अनुमति देता है:

पति की अनुपस्थिति

• जब आपका पति 4 साल से अधिक समय से लापता हो।

• जब आपका पति 7 साल या उससे अधिक समय के लिए जेल में हो।

• जब आपका पति 2 साल तक भरण-पोषण का भुगतान करने में विफल रहा हो।

बीमारी या अक्षमता

• जब आपका पति नपुंसक हो।

• जब आपका पति पागलपन या असाध्य यौन रोग से पीड़ित हों।

• अगर आपका निकाह 15 साल की उम्र से पहले हुआ हो।

दुर्व्यवहार 

• यदि आपका पति आपके साथ क्रूर व्यवहार करता है।

• जब आपका पति अपने वैवाहिक दायित्वों जैसे कि उपभोग और सहवास का पालन नहीं करता हो।

ये सभी आधार कुछ शर्तों के अधीन हैं जिन्हें अधिक समझने के लिए आपको किसी वकील से परामर्श लेना चाहिए

माता-पिता की ज़िम्मेदारी

अधिकतर अपराधों में, अपराध को साबित करने की ज़िम्मेदारी लोक अिभयोजक यानि सरकारी वकील पर होती है। परन्तु, इस कानून के तहत, यदि बाल विवाह हुआ है, तो यह माना जाएगा कि बच्चे के माता-पिता या उसके सरंक्षक बाल विवाह को रोकने में विफल रहे हैं।

यह जानना आवश्यक है कि कानून के तहत महिलाओं को जेल की सज़ा नहीं दी जा सकती है, उन पर केवल जुर्माना लगाया जा सकता है।