केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ कानून के तहत वायु प्रदूषण की निगरानी के लिए बनाए गए प्राधिकरण हैं। उनके पास निम्नलिखित शक्तियां और काम हैंः
– वायु प्रदूषण के रोकथाम, नियंत्रण और सुधार से जुड़े सभी मामलों पर केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देना।
– वायु प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कार्यक्रमों की योजना बनाना और उन्हें लागू करना।
– वायु गुणवत्ता/एक्यूआई के मानक तय करना।
– किसी राज्य में औद्योगिक संयंत्रों को चलाने की अनुमति देना। किसी भी राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पहले से ली अनुमति के बिना कोई भी औद्योगिक संयंत्र लगाए और चलाए नहीं जा सकते हैं।
अपीलीय प्राधिकरण
राज्य सरकारें पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े विवादों को संभालने के लिए अपीलीय प्राधिकरण बनाती हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक राज्य में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय कर्नाटक राज्य अपीलीय प्राधिकरण है। अगर कोई राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश के खिलाफ अपील करना चाहता है, तो वह सिविल कोर्ट में नहीं बल्कि अपीलीय प्राधिकरण में जाकर अपील करेगा।
अपीलीय प्राधिकरण के निर्णयों और आदेशों के खिलाफ अपील करने के लिए आप राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के पास जा सकते हैं । राष्ट्रीय हरित अधिकरण भारत का पहला पर्यावरण न्यायालय है, जिसके पास न केवल पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन से निपटने के लिए व्यापक अधिकार है, बल्कि ‘प्रदूषक भुगतान करता है’ सिद्धांत के अनुसार क्षतिपूर्ति, राहत और पारिस्थिति की बहाली और ‘एहतियाती सिद्धांत’ को लागू करने की शक्तियाँ भी हैं।
प्रदूषण नियंत्रण समितियां
प्रदूषण नियंत्रण समितियां नियामक निकाय हैं, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गठित होती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कुछ क्षेत्रों के लिए इन समितियों को अपनी शक्तियां और काम सौंप सकता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की स्थापना 1991 में दिल्ली के लिए एक राज्य बोर्ड के तौर में काम करने के लिए की गई थी।

