दहेज से जुड़े अपराधों के लिए जमानत

इस कानून के तहत आने वाले सभी अपराध गैर जमानती अपराध हैं। इसलिए, इस कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को अधिकार के तौर पर जमानत नहीं मिल सकती है। हालांकि, न्यायाधीश के विवेक पर जमानत दी जा सकती है

दहेज से जुड़े अपराध को साबित करना

आमतौर पर, आपराधिक कानून में शिकायत करने वाले व्यक्ति पर ही अपराध साबित करने की जिम्मेदारी होती है।


लेकिन दहेज के मामलों में जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत है, उसे यह साबित करना होता है कि वह निर्दोष हैं।


उदाहरण के लिए, अगर सिमरन शिकायत करती है कि राज ने उसके परिवार से दहेज मांगा है। इस स्थिति में, राज को यह साबित करना होगा कि उसने दहेज नहीं मांगा है।

दहेज की मांग से जुड़ी क्रूरता और मौतें


भारतीय कानून दहेज की मांग के कारण होने वाली क्रूरता और मौत को अपराध मानता है। इसे दहेज हत्या कहा जाता है। अगर पत्नी की मौत दहेज की मांग के उत्पीड़न की वजह से हुई है, तो महिला के पति और ससुराल वालों को सजा दी जा सकती है।


दहेज से जुड़ी क्रूरता और उत्पीड़न के मामलों में, आप पुलिस स्टेशन जाकर एफआईआर दर्ज करके इसकी रिपोर्ट कर सकते हैं।


दोषी पाए जाने पर पति और ससुराल वालों को 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

क्रूरता और दहेज के मामलों में गिरफ्तारी के लिए दिशानिर्देश

क्रूरता और दहेज के मामलों में गलत गिरफ्तारी और कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों की जांच करते समय पुलिस के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन्हें बाद में, गृह मंत्रालय द्वारा एक एडवाइज़री सर्कुलर यानी परामर्श परिपत्र के रूप में जारी किया गया।

पुलिस

  • क्रूरता का मामला दर्ज होने पर पुलिस को पति या ससुराल वालों को एक-दम से गिरफ्तार नहीं करना चाहिए।
  • बिना वारंट के गिरफ्तारी के लिए पुलिस के पास संतोषजनक कारण होना चाहिए।
  • सभी पुलिस अधिकारियों को एक चेकलिस्ट दी जानी चाहिए जिस में कुछ खास प्रक्रियाएं शामिल हों, जिनके हिसाब से जांच की जाए। पुलिस को आरोपी को जेल में और रखने के लिए पेश करते समय उन कारणों और सामग्रियों के साथ भरी हुई चेकलिस्ट मजिस्ट्रेट को भेजनी चाहिए, जिसके कारण गिरफ्तारी की जरूरत हुई।
  • क्रूरता के आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार न करने के पुलिस के फैसले को उस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होने की तारीख से दो हफ्ते के अन्दर मजिस्ट्रेट को भेज दिया जाना चाहिए।
  • इन निर्देशों का पालन नहीं करने वाले पुलिस अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई होगी। साथ ही  वह उच्च न्यायालय द्वारा अदालत की अवमानना ​​​​के लिए भी दंडित किए जाएंगे।

मजिस्ट्रेट

  • मजिस्ट्रेट को आरोपी की हिरासत को तभी अधिकृत करना होता है, जब वह पुलिस रिपोर्ट में गिरफ्तारी के कारणों को पढ़ ले और वह कारण वैध हो और वह उनसे संतुष्ट हो।
  • अगर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट ऊपर बताए कारण दर्ज किए बिना हिरासत को अधिकृत करते हैं, तो उन पर भी उपयुक्त उच्च न्यायालय द्वारा विभागीय कार्रवाई होगी।

दहेज हत्या के मामले

शादी के 7 साल के अन्दर जब किसी महिला की अप्राकृतिक मौत (जैसे जलने या चोट लगने के कारण) होती है और वह दहेज की मांग के कारण क्रूरता या उत्पीड़न से भी पीड़ित थी, तब यह माना जाता है कि पति या ससुराल  वालों द्वारा यह क्रूर अपराध किया गया है। 

आत्महत्या को भी अप्राकृतिक मौत का एक रूप माना जाता है। 

अगर ऊपर बताए गए सबूत मौजूद हैं, तो अदालत यह मान लेगी कि आरोपी ने अपराध किया है। इसके बाद आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसने अपराध नहीं किया है।

इस अपराध के लिए सजा जुर्माने के साथ 3 साल तक की जेल  है।