हिंदू विवाह कानून के तहत विवाह समाप्त करना

विवाह संबंधी कानून भावनात्मक और वैवाहिक आवश्यकताओं को मान्यता देता है; इसमें कई कानूनी दायित्व शामिल हैं जैसे संपत्ति का मालिक होना, अपने बच्चों की देखभाल करना आदि। जब आप अपनी शादी समाप्त करते हैं, तो वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाते हैं। लेकिन कुछ कानूनी बाध्यताएं फिर भी बनी रह सकती हैं।

वैवाहिक संबंध

कानून वैवाहिक संबंधों में इन् व्यक्यों को शामिल करता है :

• भावनात्मक सहारा

• यौन संबंध

• बच्चे और घरेलू जिम्मेदारियां

• वित्तीय सहायता

कानूनी दायित्व

आपकी शादी के दौरान आपके और आपके जीवनसाथी के कुछ कानूनी दायित्व हैं।

इनमें से कुछ दायित्व तलाक होने के बाद भी जारी रह सकते हैं। इन कानूनी दायित्वों के उदाहरण हैं:

गुजारा भत्ता या रखरखाव

• न्यायालय आपसे आपके जीवनसाथी को पैसे देने के लिए भी कह सकता है और यह एक कानूनी दायित्व है जो आपको तलाक के बाद उठाना होगा। इसे रखरखाव के रूप में जाना जाता है।

माता-पिता की ज़िम्मेदारी

• न्यायालय यह तय कर सकता है कि आपके बच्चों की कस्टडी किसके पास होगी और आर्थिक रूप से उनकी देखभाल कैसे की जाएगी।

 

हिंदू विवाह कानून के तहत तलाक के लिए फाइलिंग

तलाक आपके जीवनसाथी से अलग होने का एक अंतिम और अपरिवर्तनीय कृत्य है। इसके बावजूद अलग होने के बाद भी कुछ चीज़ें हैं जो बनी रहती हैं।

यदि वैध विवाह हुआ है, तो आप तलाक के लिए फाइल कर सकते हैं। हालांकि, यदि आपकी शादी की वैधता पर सवाल खड़ा होता है, तो आपको फिर भी अमान्यकरण के द्वारा अलग होने के लिए कानूनी रूप से अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा।

न्यायालय से संपर्क करें

तलाक का मुकदमा दायर करने के लिए आपको कोर्ट जाना होगा। जब तक तलाक का मामला चल रहा है, तब तक आप अपने जीवनसाथी और बच्चों के प्रति कुछ कर्तव्य निभाते रहेंगे जैसे कि उन्हें वित्तीय सहायता देना आदि।

यदि पति / पत्नी हिंदू विवाह कानून के तहत तलाक चाहता / चाहती है

कभी-कभी विवाह में, आप कुछ परिस्थितियों के कारण तलाक चाहते हैं (जबकि आपका जीवनसाथी नहीं)। यदि इन परिस्थितियों में कानून के तहत क्रूरता, मानसिक बीमारी आदि आती है, तो आप अपनी सुनवाई के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं।

आपका जीवनसाथी इन कारणों से इनकार कर सकता है और न्यायालय को बता सकता है कि वह तलाक क्यों नहीं चाहता है।

कानून के तहत आप शादी के एक साल बाद ही तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं।

एक साल की अवधि

अगर आप अपने जीवनसाथी के खिलाफ तलाक फाइल करना चाहते हैं, तो कानून के तहत आपको तलाक के लिए फाइल करने के लिए शादी की तारीख से एक साल की अवधि तक इंतजार करना होगा।

उदाहरण के लिए, यदि जितेंद्र और वाहिदा की शादी 9 जनवरी, 2018 को हुई है, तो जितेंद्र को वाहिदा के खिलाफ तलाक फाइल करने के लिए कम से कम 9 जनवरी, 2019 तक इंतजार करना होगा।

एक वर्ष की अवधि के अपवाद

यद्यपि कानून एक वर्ष की प्रतीक्षा अवधि देता है, ऐसे कुछ कारण हैं जिनके द्वारा पक्ष इस समय सीमा से पहले न्यायालय जा सकते हैं, जैसे:

• जीवनसाथी में से किसी एक को असाधारण कठिनाई। उदाहरण के लिए, यदि आपका पति या पत्नी हर दिन आपको शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है, तो आप तलाक की अर्जी दाखिल करने के लिए कोर्ट जा सकते हैं।

• जीवनसाथीमें से किसी एक के लिए असाधारण भ्रष्टता। उदाहरण के लिए, यदि आपका पति या आपकी पत्नी आपको अपमानजनक यौन कार्य करने के लिए कह रहे हैं।

 

हिंदू विवाह कानून के तहत आपसी सहमति से तलाक

यदि न तो आप और न ही आपका जीवनसाथी विवाह को जारी रखना चाहते हैं, तो आपके पास आपसी सहमति से तलाक के लिए आवेदन करने का विकल्प है।

आप और आपका जीवनसाथी न्यायालय जा सकते हैं यदि:

• आप दोनों एक साल से अधिक समय से अलग रह रहे हैं।

• आप दोनों एक साथ नहीं रह पाए हैं।

• आप दोनों ने अपनी शादी खत्म करने की सहमति दे दी है।

कानून के तहत आप इस तरह के तलाक के लिए शादी के एक साल बाद ही फाइल कर सकते हैं। मामला दायर करने के बाद, न्यायालय आपको अपने पति या पत्नी के साथ समझौता करने के लिए न्यूनतम 6 महीने से लेकर 18 महीने तक का समय देगा और यदि आप ऐसा करना चाहते हैं तो अपनी याचिका वापस ले लें-यह सुनिश्चित करने के लिए कि आप और आपके पति या पत्नी दोनों वास्तव में तलाक चाहते हैं या नहीं।

उदाहरण के लिए, यदि जितेंद्र और वाहिदा की शादी 9 जनवरी, 2018 को हुई है और वे एक-दूसरे को तलाक देना चाहते हैं, तो उन्हें 9 जनवरी, 2019 तक इंतजार करना होगा। 9 जनवरी 2019 को मामला दर्ज करने के बाद, अदालत उन्हें यह तय करने के लिए 6-18 महीने का समय देगी कि क्या वे तलाक के मामले को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

6 महीने की समय सीमा की यह न्यूनतम अवधि कोई सख्त नियम नहीं है क्योंकि भारत में न्यायालयों ने निम्न मामलों में समय सीमा को माफ कर दिया है जहां:

• आपके और आपके जीवनसाथी के फिर से साथ मिलने की कोई संभावना नहीं है।

• आपके और आपके जीवनसाथी के बीच मध्यस्थता और सुलह के सभी प्रयास विफल हो गए हैं।

• आपने और आपके जीवनसाथी ने उन सभी मुद्दों का समाधान कर लिया है जो आम तौर पर तलाक की कार्यवाही में उत्पन्न होते हैं, जैसे कि भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी आदि।

• यदि मुकदमा दायर करने के बाद 6 से 18 महीने की प्रतीक्षा अवधि आपकी यातना और कष्ट को बढ़ा सकती है।

• जब आपने तलाक के लिए अपने पति या पत्नी के खिलाफ मामला दायर किया है, और फिर बाद में आप और आपके पति या पत्नी दोनों एक-दूसरे को तलाक देने का फैसला करते हैं।

आप हिंदू विवाह में तलाक की अर्जी कहां दाखिल कर सकते हैं?

आप और आपका जीवनसाथी दोनों फैमिली कोर्ट में केस फाइल कर सकते हैं। अलग-अलग अदालतें हैं जिन्हें फैमिली कोर्ट के रूप में जाना जाता है और जो तलाक के मामलों को निपटाती है। आप निम्नलिखित क्षेत्रों में फैमिली कोर्ट जा सकते हैं:

आपका विवाह स्थान

या तो आप या आपका जीवनसाथी तलाक के लिए उस क्षेत्र के न्यायालय में केस दायर कर सकते हैं जहां आपका विवाह समारोह हुआ था, यानी, जहां आपका विवाह हुआ था।

उदाहरण के लिए, यदि आपकी और आपके जीवनसाथी की शादी मुंबई में हुई है, तो आप मुंबई में फैमिली कोर्ट में केस दायर कर सकते हैं।

आपके जीवनसाथी का निवास

आप उस क्षेत्र के न्यायालय में मामला दायर कर सकते हैं जहां आपका जीवनसाथी रहता है। उदाहरण के लिए, यदि आप नई दिल्ली में रहने वाली अपनी पत्नी के खिलाफ मामला दर्ज कर रहे हैं, तो आप दिल्ली में फैमिली कोर्ट में मामला दर्ज कर सकते हैं।

आपका अंतिम निवास स्थान जहां आप एक साथ रहते थे 

या तो आप और आपका जीवनसाथी तलाक के लिए उस इलाके की अदालत में फाइल कर सकते हैं जहां आप दोनों आखरी बार साथ रह रहे थे । उदाहरण के लिए, यदि आप और आपकी पत्नी पिछली बार दिल्ली में एक साथ रहते थे, तो आप दोनों में से किसी के पास नई दिल्ली में फैमिली कोर्ट जाने का विकल्प है।

आपका निवास स्थान

पत्नी 

अगर आप अपने पति के खिलाफ तलाक का केस फाइल कर रही हैं तो आप जिस इलाके में रह रही हैं उस इलाके की कोर्ट जा सकती हैं।

उदाहरण के लिए, यदि आप बेंगलुरु में रह रही हैं, तो आप अपने पति के खिलाफ बेंगलुरु के फैमिली कोर्ट में मामला दायर कर सकती हैं, भले ही आपका पति वहां नहीं रह रहा हो।

दोनों 

यदि आपका जीवनसाथी विदेश चला गया है तो आप इसे अपने निवास स्थान पर दाखिल कर सकते हैं।

हालांकि, कोर्ट में केस फाइल करते समय कृपया अपने वकील से सलाह लें।