क्रूरता और दहेज के मामलों में गलत गिरफ्तारी और कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों की जांच करते समय पुलिस के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन्हें बाद में, गृह मंत्रालय द्वारा एक एडवाइज़री सर्कुलर यानी परामर्श परिपत्र के रूप में जारी किया गया।
पुलिस
- क्रूरता का मामला दर्ज होने पर पुलिस को पति या ससुराल वालों को एक-दम से गिरफ्तार नहीं करना चाहिए।
- बिना वारंट के गिरफ्तारी के लिए पुलिस के पास संतोषजनक कारण होना चाहिए।
- सभी पुलिस अधिकारियों को एक चेकलिस्ट दी जानी चाहिए जिस में कुछ खास प्रक्रियाएं शामिल हों, जिनके हिसाब से जांच की जाए। पुलिस को आरोपी को जेल में और रखने के लिए पेश करते समय उन कारणों और सामग्रियों के साथ भरी हुई चेकलिस्ट मजिस्ट्रेट को भेजनी चाहिए, जिसके कारण गिरफ्तारी की जरूरत हुई।
- क्रूरता के आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार न करने के पुलिस के फैसले को उस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होने की तारीख से दो हफ्ते के अन्दर मजिस्ट्रेट को भेज दिया जाना चाहिए।
- इन निर्देशों का पालन नहीं करने वाले पुलिस अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई होगी। साथ ही वह उच्च न्यायालय द्वारा अदालत की अवमानना के लिए भी दंडित किए जाएंगे।
मजिस्ट्रेट
- मजिस्ट्रेट को आरोपी की हिरासत को तभी अधिकृत करना होता है, जब वह पुलिस रिपोर्ट में गिरफ्तारी के कारणों को पढ़ ले और वह कारण वैध हो और वह उनसे संतुष्ट हो।
- अगर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट ऊपर बताए कारण दर्ज किए बिना हिरासत को अधिकृत करते हैं, तो उन पर भी उपयुक्त उच्च न्यायालय द्वारा विभागीय कार्रवाई होगी।
