जिलेवार घरेलू हिंसा पर मार्गदर्शिका
चुनौती : नीचे दी गई जानकारी शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा, दुर्व्यवहार, गाली-गलौज के बारे में है, जो कुछ लोगों को परेशान या बेचैन कर सकती है।
घरेलू हिंसा
1- परिचय और अवधारणाएं
1A. विषय का महत्व
भारत में हर 3 में से 1 महिला कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार होती है। लेकिन कई महिलाएं यह पहचान नहीं पातीं कि उनके साथ हो रहा व्यवहार कानूनी रूप से हिंसा है या कुछ और। इस जानकारी के माध्यम से महिलाएं अपने अधिकारों को जान पाएंगी और समय आने पर जरूरी मदद ले सकेंगी।
हमारे समाज में घरेलू हिंसा एक गंभीर समस्या है, जो देश में लाखों महिलाओं को प्रभावित करती है। यह समस्या केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक, यौन- शोषण, मौखिक और आर्थिक शोषण भी शामिल है। ज्यादातर मामलों में महिलाएं यह नहीं पहचान पाती कि उनके साथ हो रहा व्यवहार “घरेलू हिंसा” के अन्दर आता है। महिलाएं घरेलू हिंसा को आम समस्या मानकर चुप रहती हैं और हो रही हिंसा को सहती हैं ।
इस विषय को समझना जरूरी है, क्योंकि:
- इससे महिलाएं अपने अधिकारों को पहचान सकती हैं ।
- महिलाएं समय रहते मदद ले सकती हैं।
- समाज में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती हैं।
- जीविका और PLVs जैसी संस्थाएं सही जानकारी देकर महिलाओं के प्रति समाज में बदलाव ला सकते हैं।
1B. घरेलू हिंसा क्या है?
घरेलू हिंसा वह हिंसा है, जो शारीरिक, मानसिक, यौन, आर्थिक या मौखिक उत्पीड़न के रूप में महिला और उसके बच्चों के जीवन को प्रभावित करती है। घरेलू हिंसा में मारपीट, गाली-गलौज, यौन उत्पीड़न, पैसे या संपत्ति से वंचित करना आदि शामिल है।
घरेलू हिंसा किसी महिला या उसके संरक्षण में रहने वाले बच्चों के खिलाफ किया गया कोई भी ऐसा कार्य है जो उनके:
- शारीरिक स्वास्थ्य,
- मानसिक स्थिति,
- यौन शुचिता (अनैतिक या गैरकानूनी यौन गतिविधि),
- आर्थिक स्वतंत्रता या
- जीवन की गरिमा को नुकसान पहुंचाता है।
यह हिंसा केवल पति द्वारा ही नहीं, बल्कि परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा की जा सकती है — चाहे वह सास, देवर, जेठ, ननद या कोई भी व्यक्ति हो ।
घरेलू हिंसा के कुछ उदाहरण हैं-
- मारपीट या चोट पहुंचाना
- मानसिक या भावनात्मक प्रताड़ना देना
- यौन उत्पीड़न (जैसे कि बिना इच्छा के यौन संबंध बनाना)
- पैसे या संपत्ति से वंचित करना
- रोज़मर्रा के खर्चों से रोकना
- गालियां देना या धमकाना
1C. कौन से कानून लागू होते हैं?
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा के लिए, देश में कई महत्वपूर्ण कानून मौजूद हैं। इन कानूनों में दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की राहतें शामिल हैं:
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
(Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005)
- यह कानून एक दीवानी (सिविल) कानून है, जो पीड़ित महिला को जल्दीऔर प्रभावी राहत देने के लिए बनाया गया है।
- इसके तहत महिला को निम्नलिखित राहतें मिल सकती हैं:
- संरक्षण आदेश (Protection Order)
- निवास आदेश (Residence Order)
- मुआवज़ा (Compensation Order)
- बाल अभिरक्षा यानी बच्चे की कस्टडी (Custody Order)
- यह कानून केवल शादीशुदा महिलाओं पर ही नहीं, बल्कि लिव-इन पार्टनर, ससुराल में रह रही महिला रिश्तेदारों और संयुक्त परिवार में रहने वाली महिलाओं पर भी लागू होता है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaaya Sanhita – BNS)
(BNS को IPC के स्थान पर लागू किया गया है)
धारा 85: क्रूरता (Cruelty)
- यह धारा अब IPC की धारा 498A की जगह लागू होती है।
- इसमें पति या ससुराल वालों द्वारा महिला के साथ की गई क्रूरता, मानसिक उत्पीड़न, या दहेज की मांग को अपराध माना गया है।
- दोषी पाए जाने पर जेल और जुर्माने की सजा है।
- घरेलू हिंसा संरक्षण नियम, 2006
(Protection of Women from Domestic Violence Rules, 2006)
- यह नियम घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के लागू होने से जुड़े सभी निर्देश को बताता /देता है।
- इसमें संरक्षण अधिकारियों, सेवा प्रदाताओं, और मजिस्ट्रेट की भूमिका को साफ तौर पर बताया गया है।
- दूसरे कानून
दहेज निषेध अधिनियम, 1961
- दहेज की मांग या दहेज से जुड़ी हिंसा इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध है।
- दोषी पाए जाने पर जेल और जुर्माने की सजा है।
बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005 (POCSO एवं JJ Act)
- अगर घरेलू हिंसा का पीड़ित बच्चों पर प्रभाव डालता है, तो यह कानून बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण को तय करता है।
- उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्देश
- न्यायालयों ने कई ऐसे फैसलेदिए हैं, जो घरेलू हिंसा की परिभाषा, राहत की सीमा, और महिला के अधिकारों को सही तरह से बताते हैं।
- उदाहरण के लिए: Hiral P. Harsora बनाम Kusum Narottamdas Harsora (2016) में यह साफ किया गया कि घरेलू हिंसा में महिला द्वारा दूसरी महिला के खिलाफ की गई हिंसा को भी शामिल किया जा सकता है, अगर वे उसी घर में रहती थीं।
नोट:
- PLVs और जीविका सदस्य अब सभी महिलाओं को जानकारी देते समय BNS के बारे में बताएं, खासतौर पर “क्रूरता” के बारे में बताएं। • किसी भी एफआईआर या आपराधिक कार्रवाई में पुरानी IPC 498A की जगह पर अब धारा 85, BNS लागू होगी ।
1D. घरेलू हिंसा के प्रकार
घरेलू हिंसा केवल मारपीट नहीं होती, बल्कि इसके कई रूप हो सकते हैं:
- शारीरिक हिंसा
- थप्पड़ मारना, लात घूंसे मारना, जलाना, चोट पहुंचाना।
- मानसिक/मौखिक हिंसा
- गाली देना, अपमान करना, बार-बार ताने मारना, आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना।
- यौन हिंसा
- महिला की इच्छा के बिना यौन संबंध बनाना, जबरन गर्भवती करना या गर्भपात करवाना।
- आर्थिक हिंसा
- महिला को पैसे न देना, खर्चों से रोकना, उसका स्त्रीधन या गहने छीन लेना, काम करने से रोकना।
- सामाजिक हिंसा
- महिला को घर से बाहर निकलने से रोकना, दोस्तों-रिश्तेदारों से ना मिलने देना।
1E. पीड़ित कौन हो सकती है?
घरेलू हिंसा की पीड़ित कोई भी महिला हो सकती है, जैसे कि:
- पत्नी (कानूनी या लिव-इन पार्टनर)
- बहू
- मां या सास
- बेटी या पोती
- विधवा महिला
- अविवाहित महिला जो परिवार में रहती हो
- गोद ली गई बेटी या मां
ध्यान रखें : पीड़ित तलाकशुदा, परित्यक्ता (बिना तलाक के छोड़ दिया हो) या विधवा भी हो सकती है, अगर वह आरोपी के साथ पहले रह चुकी हो।
1F. आरोपी कौन हो सकता है?
पति, लिव-इन पार्टनर, ससुर, देवर, भाभी, सास, ननद, भाई, बहन—कोई भी जिसने हिंसा की हो और जिसके साथ महिला के घरेलू संबंध हों ।
घरेलू हिंसा का आरोपी कोई भी वयस्क पुरुष हो सकता है, जैसे:
- पति
- पिता या सौतेला पिता
- ससुर या दादा
- बेटा, सौतेला बेटा
- देवर, जेठ, भाई
- चाचा, भतीजा
ध्यान रखें: अगर कोई भी महिला हिंसा में शामिल हो, जैसे सास, ननद, जेठानी, तो उनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज हो सकती है, अगर वे उसी घर में साथ रहती थीं।
1G. घरेलू हिंसा कहाँ हो सकती है?
घरेलू हिंसा की जगह सिर्फ घर तक नहीं होती । यह कहीं भी हो सकती है, जैसे:
- घर के अंदर
- कार्यस्थल पर
- बच्चों के स्कूल में
- बाजार या सार्वजनिक स्थानों पर
- न्यायालय में तलाक या कस्टडी के दौरान
- शादी के बाद, तलाक के बाद, या लिव-इन रिश्ते के खत्म होने के बाद
“संयुक्त निवास (Shared Household)” की परिभाषा
जिस घर में महिला और आरोपी ने एक साथ समय बिताया हो—चाहे वह घर महिला का न हो, तब भी वह “संयुक्त निवास” माना जाएगा और वहां हुई हिंसा को घरेलू हिंसा माना जाएगा।
- प्रक्रिया और अधिकारी
घरेलू हिंसा के मामलों में मदद पाने की एक तय प्रक्रिया है, जिसमें कई प्रकार के अधिकारी और संस्थाएं शामिल होती हैं। यहां आपको बताया जाएगा कि शिकायत कहां और कैसे दर्ज करनी है और कौन-कौन से अधिकारी आपकी मदद कर सकते हैं।
2A. शिकायत कहां और कैसे दर्ज करें?
- नजदीकी पुलिस स्टेशन या किसी भी थाने में शिकायत करें
- घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) संरक्षण अधिकारी द्वारा दर्ज की जाती है
- महिला आयोग, NGO/ सेवा प्रदाता या PLVs (पैरा लीगल वॉलंटियर्स) की मदद से भी शिकायत की जा सकती है
- पुलिस स्टेशन में शिकायत
- आप नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर एक आवेदन दे सकती हैं
- अगर महिला थाना पास / उपलब्ध हो, तो वहां शिकायत दर्ज करना आपके लिए फायदेमंद होगा,क्योंकि वहां पर कई महिला अधिकारी नियुक्त होती हैं।
- संरक्षण अधिकारी (Protection Officer) से संपर्क करें
- हर जिले में एक संरक्षण अधिकारी नियुक्त किया गया है , जो घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत काम करता है।
- ये अधिकारी घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) दर्ज करते हैं, जो न्यायालय में राहत की मांग के लिए जरूरी होती है।
- महिला आयोग/NGO/सेवा प्रदाता से मदद लें
- अगर महिला पुलिस स्टेशन या संरक्षण अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं, तो आप किसी पंजीकृत NGO या महिला आयोग से संपर्क कर सकती हैं।
- वे आपको सही प्रक्रिया बताएंगे और कागज़ी कार्रवाई में मदद करेंगे।
- पैरा लीगल वॉलंटियर्स (PLVs) की मदद
- PLVs जीविका समूहों से जुड़े सहयोगी प्रशिक्षित होते हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में पीड़ित महिलाओं को कानूनी जानकारी, मार्गदर्शन और संबंधित अधिकारियों से मिलने जैसे काम करते हैं।
2B. घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) क्या है?
यह एक दस्तावेज़ है, जो घरेलू हिंसा के मामलों के लिए खासतौर पर तैयार होता है। इसमेंआरोपी और पीड़िता की जानकारी, घटना का विवरण आदि होता है।
- DIR एक विशेष रिपोर्ट होती है, जो केवल घरेलू हिंसा के मामलों के लिए बनाई गई है।
- इसे संरक्षण अधिकारी या सेवा प्रदाता तैयार करते हैं।
- इसमें पीड़िता और आरोपी का विवरण, हिंसा की तारीख, प्रकार (शारीरिक, मानसिक, आर्थिक आदि), पीड़िता की ज़रूरतें (शेल्टर, काउंसलिंग, सुरक्षा) आदि दर्ज होता है।
- यह रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत की जाती है, जो इसके आधार पर राहत देते हैं।
यह रिपोर्ट FIR के समान ही महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सिविल राहत के लिए होती है न कि सजा के लिए।
2C. मजिस्ट्रेट की भूमिका
- शिकायत और DIR के आधार पर राहत आदेश देना
- सुरक्षा, निवास, मुआवज़ा, और बच्चों की कस्टडी से जुड़ी सुनवाई करना
- काउंसलिंग का आदेश देना
मजिस्ट्रेट घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में केंद्र बिंदु होते हैं। उनका काम है:
- DIR पर विचार करना
- अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि घरेलू हिंसा हुई है, तो वे जल्द ही अंतरिम आदेश जारी कर सकते हैं।
- राहत आदेश देना
- महिला की सुरक्षा, निवास, आर्थिक सहायता (मुआवज़ा), और बच्चों की कस्टडी से संबंधित आदेश जारी कर सकते हैं।
- काउंसलिंग का आदेश
- मजिस्ट्रेट आरोपी और पीड़िता दोनों को व्यक्तिगत या संयुक्त रूप से काउंसलिंग करवाने के निर्देश दे सकते हैं।
- फ्री कानूनी सहायता की जानकारी देना
- मजिस्ट्रेट की यह जिम्मेदारी है कि वे महिला को बताएँ कि वह फ्री कानूनी सहायता, सेवा प्रदाता, और शेल्टर होम जैसी सेवाओं का लाभ ले सकती हैं।
2D. संरक्षण अधिकारी की भूमिका
- DIR तैयार करना
- न्यायालय में आवेदन देना
- महिला को शेल्टर, मेडिकल, काउंसलिंग जैसी सेवाएं दिलाना
- PLVs के साथ मिलकर काम करना
संरक्षण अधिकारी घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत नियुक्त एक सरकारी अधिकारी होता है। इनकी प्रमुख जिम्मेदारियां हैं:
- घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) तैयार करना
- पीड़िता की बात सुनकर विस्तृत रिपोर्ट बनाते हैं।
- मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना
- पीड़िता की ओर से राहत आदेशों (protection, residence, custody, compensation) के लिए आवेदन करते हैं।
- सेवाएं उपलब्ध कराना
- महिला को मेडिकल सहायता, काउंसलिंग, शेल्टर, और कानूनी सहायता जैसी सेवाओं से जोड़ते हैं।।
- PLVs और NGOs के साथ मिलकर काम करना
- पैरा लीगल वॉलंटियर्स (PLVs) और NGOs के साथ मिलकर यह देखना कि महिला को समय पर मदद मिले।
2E. सेवा प्रदाता
पंजीकृत NGO या संस्था जो पीड़िता को:
- मेडिकल सहायता
- शेल्टर
- काउंसलिंग
- कानूनी मार्गदर्शन
- केस फाइलिंग में मदद करते हैं
सेवा प्रदाता वे संस्थाएं होती हैं, जो सरकार द्वारा पंजीकृत होती हैं और घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को कई तरह की मदद देती हैं।
सेवा प्रदाताओं की भूमिका:
- मेडिकल सहायता: चोट लगने पर इलाज कराना, मेडिकल रिपोर्ट बनवाना।
- शेल्टर होम: सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था करना।
- काउंसलिंग: मानसिक और भावनात्मक सपोर्ट देना।
- कानूनी सहायता: वकील से मिलवाना या केस की जानकारी देना।
- घरेलू घटना रिपोर्ट तैयार करना: अगर संरक्षण अधिकारी मौजूद नहीं है, तो सेवा प्रदाता भी DIR बना सकते हैं।
इन्हें घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अंतर्गत पंजीकृत होना जरूरी है और इनकी सेवाएं अधिकतर मामलों में फ्री होती हैं।
- घरेलू हिंसा कानून के अंतर्गत राहतें
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला को केवल आरोपी को सजा दिलवाने का ही नहीं, बल्कि खुद के जीवन को सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से दुबारा जीने का भी अधिकार है। इसके लिए कानून में चार प्रमुख तरह की राहतें मौजूद हैं:
3A. संरक्षण आदेश
➤ यह क्या है?
यह आदेश न्यायालय द्वारा जारी किया जाता है, ताकि पीड़िता और उसके बच्चों को आरोपी की किसी भी प्रकार की हिंसा, धमकी या प्रताड़ना से सुरक्षित रखा जा सके।
➤ क्या-क्या हो सकता है ?
- आरोपी को महिला से सीधे या परोक्ष रूप से संपर्क करने से रोका जा सकता है।
- आरोपी को महिला के निवास, कार्यस्थल या बच्चों के स्कूल के पास आने से मना किया जा सकता है।
- आरोपी को महिला की संपत्ति या बैंक खाते में दखल देने से रोका जा सकता है।
➤ मकसद :
पीड़िता को एक दम से सुरक्षा देना और आगे किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक, या यौन हिंसा को रोकना।
3B. निवास आदेश
➤ यह क्या है?
इस आदेश के तहत पीड़िता को उस घर में रहने का अधिकार मिलता है, जिसे उसने आरोपी के साथ साझा किया हो, चाहे वह घर किसी के भी नाम पर हो।
➤ क्या-क्या हो सकता है?
- महिला को उसी घर में रहने की अनुमति दी जाती है।
- आरोपी को घर छोड़ने का निर्देश दिया जा सकता है।
- आरोपी को घर की बिक्री, किराए पर देने या किसी तीसरे व्यक्ति को कब्जा देने से रोका जा सकता है।
➤ उदाहरण:
अगर घर आरोपी की मां के नाम पर है, लेकिन महिला उसी घर में रहती थी, तो उसे वहाँ से निकाला नहीं जा सकता — कानून उस घर को “संयुक्त निवास (Shared Household)” का दर्जा देता है।
3C. मुआवज़ा आदेश
आर्थिक नुकसान, मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवज़ा
➤ यह क्या है?
इस आदेश में आरोपी को महिला को आर्थिक रूप से मुआवज़ा (Compensation) देने के लिए कहा जाता है, अगर उसे घरेलू हिंसा के कारण मानसिक या आर्थिक नुकसान हुआ हो।
➤ क्या-क्या हो सकता है?
- मानसिक आघात या तनाव के लिए मुआवज़ा
- इलाज का खर्च
- कमाई के नुकसान का मुआवज़ा
- गहने या अन्य संपत्ति जो छीन ली गई हो उसको दुबारा देना
➤ अगर आरोपी भुगतान न करे:
- न्यायालय आरोपी की सैलरी से कटौती का आदेश दे सकता है
- आरोपी के बैंक खाते या संपत्ति से पैसे की वसूली की जा सकती है
3D. बाल अभिरक्षा (बच्चे की कस्टडी ) आदेश
बच्चों की कस्टडी महिला को देना; आरोपी को मिलने से रोकना
बाल अभिरक्षा आदेश (Custody Order)
➤ यह क्या है?
इस आदेश के माध्यम से न्यायालय बच्चों की अस्थायी या स्थायी कस्टडी महिला को सौंप सकता है, अगर यह बच्चों के हित में हो।
➤ क्या-क्या हो सकता है ?
- आरोपी को बच्चों से मिलने से रोका जा सकता है, अगर उससे बच्चों को मानसिक या शारीरिक खतरा हो।
- महिला को बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पालन-पोषण का एकमात्र अधिकार दिया जा सकता है।
- बच्चों से मिलने के लिए आरोपी को न्यायालय की अनुमति लेनी होगी।
➤ मकसद:
बच्चों की सुरक्षा और यह तय करना कि उनका पालन-पोषण सुरक्षित वातावरण में हो।
न्यायालय द्वारा आदेश देने के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत हो सकती है?
- घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR)
- पीड़िता का आवेदन
- मेडिकल रिपोर्ट (अगर हिंसा के सबूत हों)
- गवाहों के बयान (अगर हों)
- PLV या सेवा प्रदाता की रिपोर्ट
- बिहार में सहायता प्रणालियाँ
घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं को केवल कानूनी जानकारी ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक मदद, सुरक्षित स्थान, और मनोवैज्ञानिक मदद की भी जरूरत होती है। बिहार राज्य में कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इस तरह की मदद के लिए काम करती हैं। ।
4A. कानूनी सहायता
बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (BLSA)
- BLSA घरेलू हिंसा सहित सभी तरह के मामलों में फ्री कानूनी सहायता देता है।
- इसका मकसद न्याय को गरीब, बेसहारा और ज़रूरतमंद व्यक्तियों तक पहुंचाना है।
जरूरी हेल्पलाइन नंबर:
बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण
स्थान: बुद्ध मार्ग, संग्रहालय के सामने, पटना – 800001
- सदस्य सचिव (Member Secretary): 0612-2508943
- संयुक्त सचिव (Joint Secretary): 0612-2508441
- रजिस्ट्रार (Registrar): 0612-2508366
- फैक्स नंबर: 0612-2508390
- टोल फ्री नंबर: 15100
पटना उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति
स्थान: पटना उच्च न्यायालय परिसर
फोन: 0612-2504475 / 2504477
मोबाइल: 8544343450
ईमेल: phclsc@gmail.com
जिला वार विवरण:
- अररिया
स्थान: सिविल कोर्ट परिसर, अररिया – 854311
मोबाइल: 9006732464
ईमेल: dj.araria-bih@gov.in - औरंगाबाद
स्थान: विधिक सेवा सदन, सिविल कोर्ट, औरंगाबाद
फोन: 06186-222223
ईमेल: dlsaaurangabad2012@gmail.com - बांका
स्थान: सिविल कोर्ट परिसर, बांका
मोबाइल: 9122669942
ईमेल: dlsabanka@gmail.com - बेगूसराय
स्थान: सिविल कोर्ट, बेगूसराय – 851101
मोबाइल: 8210345569
ईमेल: dj.begusarai-bih@indianjudiciary.gov.in - भागलपुर
स्थान: एडीआर भवन, सिविल कोर्ट, भागलपुर
फोन: 0641-2401017
ईमेल: clsa_bhagalpur@yahoo.com - भोजपुर (आरा)
स्थान: सिविल कोर्ट परिसर, भोजपुर
फोन: 06182-222555
ईमेल: clsa_bhojpur@yahoo.com - बक्सर
स्थान: विधिक सेवा सदन, सिविल कोर्ट, बक्सर
फोन: 06183-226225
मोबाइल: 8935929524 / 7795073906
ईमेल: dlsa.buxar@gmail.com - दरभंगा
स्थान: एडीआर-सह-मध्यस्थता केंद्र, सिविल कोर्ट, लहेरियासराय
फोन: 06272-240113
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स्थान: सिविल कोर्ट, मोतीहारी
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स्थान: सिविल कोर्ट, गया
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फोन: 06154-242188
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स्थान: सिविल कोर्ट परिसर
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स्थान: सिविल कोर्ट परिसर
फोन: 06341-223006
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स्थान: एडीआर भवन, सिविल कोर्ट परिसर – 845438
फोन: 06254-241011
ईमेल: clsa_bettiah@yahoo.com
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बिहार – सचिव संपर्क निर्देशिका
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अररिया – 7070092401
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, औरंगाबाद – 7070092402
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बांका – 7070092403
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बेगूसराय – 7070092404
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, पश्चिम चंपारण (बेतिया) – 7070092405
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कैमूर (भभुआ) – 7070092406
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, भागलपुर – 7070092407
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, भोजपुर (आरा) – 7070092408
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बक्सर – 7070092409
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, दरभंगा – 7070092410
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, गया – 7070092411
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, गोपालगंज – 7070092412
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, वैशाली (हाजीपुर) – 7070092413
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जमुई – 7070092414
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जहानाबाद – 7070092415
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कटिहार – 7070092416
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, खगड़िया – 7070092417
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, किशनगंज – 7070092418
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लखीसराय – 7070092419
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मधेपुरा – 7070092421
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मधुबनी – 7070092422
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, पूर्वी चंपारण (मोतीहारी) – 7070092423
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मुंगेर – 7070092424
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मुजफ्फरपुर – 7070092425
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, नालंदा (बिहारशरीफ) – 7070092426
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, नवादा – 7070092427
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, पटना – 7070092428
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, पूर्णिया – 7070092429
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, रोहतास (सासाराम) – 7070092430
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सहरसा – 7070092431
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, समस्तीपुर – 7070092432
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सारण (छपरा) – 7070092433
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, शेखपुरा – 7070092434
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, शिवहर – 7070092435
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सीतामढ़ी – 7070092436
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सीवान – 7070092437
- सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सुपौल – 7070092438
उपलब्ध सेवाएं:
- प्रशिक्षित और पैनल में शामिल नि:शुल्क वकील
- PLVs के माध्यम से केस की तैयारी और न्यायालय में सहायता
- महिला लोक अदालतों (Legal Aid Camps) में सलाह और सुनवाई
कैसे संपर्क करें?
- जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) कार्यालय में जाकर
- टोल-फ्री नंबर पर फोन करके
4B. गैर-कानूनी सहायता
- पंजीकृत NGOs (जैसे: महिला हेल्पलाइन, सेवा केन्द्र)
- शेल्टर होम्स
- महिला थाना और OSC
5A. PLVs कौन होते हैं?
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रशिक्षित समुदाय-आधारित कार्यकर्ता, जो महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी देते हैं।
5B. जीविका के तहत PLVs कैसे मदद करते हैं?
- जीविका समूहों में हिंसा की पहचान
- पीड़िता को जानकारी देना
- DIR भरवाना और संरक्षण अधिकारी से संपर्क कराना
- केस न्यायालय तक ले जाने में मदद करना
- गोपनीयता बनाए रखना और महिला के साथ संवेदनशीलता से पेश आना
5C. नेटवर्किंग और फॉलो-अप
- मेडिकल सहायता, शेल्टर, पुलिस और काउंसलिंग सेवाओं से जोड़ना
- केस की स्थिति पर नजर रखना
- समुदाय में जागरूकता फैलाना
6B. सवाल-जवाब
घरेलू हिंसा पर “हाँ / नहीं” पर बने सवाल-जवाब
- क्या बहन या सास द्वारा की गई हिंसा को भी घरेलू हिंसा माना जा सकता है?
हाँ - क्या केवल पति द्वारा की गई हिंसा ही घरेलू हिंसा कहलाती है?
नहीं - क्या आर्थिक उत्पीड़न भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है?
हाँ - क्या महिला को घर से निकालना घरेलू हिंसा है?
हाँ - क्या मानसिक तनाव देना या अपमान करना भी घरेलू हिंसा हो सकतीहै?
हाँ - क्या महिला लिव-इन पार्टनर पर घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज करा सकती है?
हाँ - क्या महिला को घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने के लिए केवल अपने ही जिले में जाना ज़रूरी है?
नहीं (वह किसी भी पुलिस स्टेशन या Protection Officer से संपर्क कर सकती है) - क्या घरेलू हिंसा अधिनियम केवल शादीशुदा महिलाओं पर लागू होता है?
नहीं - क्या मजिस्ट्रेट महिला को उसके घर में रहने का अधिकार दिला सकते हैं?
हाँ - क्या घरेलू हिंसा के मामलों में मेडिकल रिपोर्ट जरूरी सबूत मानी जाती है?
हाँ - क्या PLVs महिलाओं को घरेलू हिंसा मामलों में DIR भरने में मदद कर सकते हैं?
हाँ - क्या न्यायालय आरोपी को महिला से दूर रहने का आदेश दे सकती है?
हाँ (Protection Order) - क्या महिला अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत तब नहीं कर सकती, जब वह कामकाजी हो?
नहीं (कामकाजी महिला भी शिकायत दर्ज करा सकती है) - क्या बच्चे घरेलू हिंसा के मामलों में पीड़ित माने जा सकते हैं?
हाँ - क्या बार-बार दहेज मांगना घरेलू हिंसा का एक रूप है?
हाँ